
|| कछुए की पीठ पर ||
कछुए की पीठ पर चिकोटी काटते
क्या है मेरे पास अपने शब्दों की
सचाई नापने के लिए
सिवा एक बूढ़ी
और जगह-जगह चिटखी हुई नस के !
ज़बान में तालू की तरह
चिपका यह बोझ
किसी अनजान आदमी का
अब मेरे सिर से अलग नहीं
हर आती-जाती गाड़ी के साथ
खामखाह थरथराता...
कितना अजीब है यह मकान
जिसमें मेहमान हूँ मैं
छुट्टी मनाने के रास्ते में
सड़ते खलिहान... और
ओलों से पटे हुए बागीचे
भूल गया हूँ मैं
किधर से आया था
किधर को जाऊँगा
घंटा भर पहले ट्रक से कुचला हुआ कुत्ता
अभी... हाँफ रहा है
मैं किस को बनाऊँ अपना आईना
उन सूखे ढोकों को
इस गँदली बाढ़ को?
ज़िन्दा कविता सन्निपात का पुल है
इस बेख़बर बहाव में
भीगने से इनकार करते हुए
ठहर जाती है मेरी निगाह
सड़क के आरपार लेटी हुई छाया पर

|| फ़िलहाल ||
फूटा एक रंग
अँधेरे का
अँधेरे में
रात भर सोई सड़क
उठती दीवार सी
खोलती खिड़की एक
देखती अँधेरे में
रंगा हुआ आसमान
रंगों की हलचल थी सुबह कभी
रंगों की नींद रात
सपने दिखाती थी रंग के
रंग है अभी तो
फ़िलहाल यह अँधेरा
सड़क की आहट पर
टूटता हुआ आसमान
छूटता हुआ घर
टूटना नहीं है यह
छूटना नहीं है सिर्फ़
हल्का पड़ जाना है
रंगों की तरह...
लौटता है घर आसमान को
लौटती हैं सड़कें
सड़कों को लपेट कर
लौटतीं एक दीवार ओढ़कर सड़कें
गुम हो जातीं
अपने अँधेरे में
लौटते हैं रंग फिर
लौटता अँधेरा
लौटते हैं तारे
लौटते अनन्त घर
अनन्त आसमान में

|| चोटियाँ ||
चोटियाँ
रहने के लिए नहीं होतीं
और घाटियाँ
सिर्फ़ बहने के लिए होती हैं |
चोटियाँ
गल-गल कर
घाटियों तक पहुचती हैं |
घाटियाँ
कल-कल कर
उन्हीं का स्वर गुँजाती हैं |
दोनों से अलग
दोनों की सुनता मै
इस भूगोल का क्या करूँ ?
जो न रहने की बात जानता है
न बहने की;
जो जानता है सिर्फ़ अपने
दहने को, सहने को;
जो
उस दहने और सहने के ही
कहने में आकर
उन्हें कभी भी नहीं पाता
सिर्फ़
कहने को तरसता है
चोटियों को |
घाटियों को |

|| नाम काट दो ||
बन हो गई है मेरी समझ
चाभी देना
मै अक्सर भूल जाता हूँ
मेरा नाम काट दो |
मुझे अपनी कक्षा तक
याद नहीं रहती |
साड़ी कक्षाएँ मुझे एक सी दिखती हैं |
बावजूद लगातार मौजूद रहने के
उपस्थिति मेरी बेतहाशा
गिर रही है |
मुझे कुछ भी नहीं सूझता |
श्यामपट पर भी
एक धुँधले काले
एक धुँधले सफ़ेद के सिवा
कुछ भी नहीं दीखता मुझे
कुछ भी नहीं सूझता |
मुझे कुछ भी नहीं सुनाई पड़ता
सिवा एक अंतहीन शोर के...|
कक्षा में रहकर भी मुझे यही लगता है |
बाहर खड़ा हूँ मैं
जबकि बाहर मुझे कोई नहीं करता
जबकि मैं चाहे जिस कक्षा में घुस जाऊँ
मुझे कोई कुछ भी नहीं कहता |
मुझे अंदर रखने में जाने किसकी कुशल है
मुझे नहीं मालूम |
मेरी बदतमीज़ियाँ भी
लौट-लौट आई हैं मेरे पास बाइज्ज़त |
आम शरारतों को दुहरा-दुहरा कर भी
वापस नहीं ला सका मैं
अब तक अपनी याददाश्त |
मैं अपनी ग्लानि का किससे लूँ प्रतिशोध ?
गुरुओं ? सहपाठियों से?
मेरा नाम काट दो |
मुझे अपनी ग्लानि में तो कम से कम,
मौलिक रह जाने दो |
मेरा चाल-चलन अब सुधरने से रहा;
कोई राज़ बाकी अब उघरने से रहा;
मेरी उम्मीद छोड़ दो |
इतनी सारी बहियों में
किसी के भी नाम के साथ
मेरा काम जोड़ दो |
रहा मेरा भविष्य
उस भरे घड़े को तुम
प्रार्थना सभा में कल
सबके सामने फोड़ दो |
मेरा नाम काट दो |
सुना मेरा बाप भी कभी
इसी स्कूल में पढ़ता था |
उसका नाम रहने दो |
मेरा नाम काट दो |
[ हिंदी के प्रख्यात साहित्यकार रमेशचंद्र शाह उन बिरले रचनाकारों में से एक हैं जिनके लिये लेखन की तमाम ज्ञात एवं अज्ञात विधाओं को एक साथ साध लेने का कौशल जुड़ा है | यहाँ उनकी कविताओं के साथ लगे चित्र अहमदाबाद के युवा चित्रकार अर्पित बिलोरिया की पेंटिंग्स के हैं | ]