Friday, August 12, 2011

लीलाधर मंडलोई की एक गद्य कविता

|| हत्यारे उतर चुके हैं क्षीरसागर में ||



















(एक)
मैं रोज़ सोता था सुकून की नींद | और अब जागता हूँ जैसे नींद में | भयावह सपनों में डूबी हैं रातें | मैं हत्यारों को देखता हूँ सपनों में | उनके चेहरे अमूर्त हैं | बस उनका होना परिचितों-सा लगता है | वे बनक-ठनक में सभ्य संभ्रांत दीखते हैं | उनके पास भव्य मोटरें हैं | वे अमूमन बड़ी-बड़ी कोठियों से निकलकर आते हैं | उनके पीछे चलने वालों की जमात है | जो नई-नई शक्ल में हर जगह उपस्थित हैं | वे हथियारों से लैस हैं | उनकी आत्मा का पानी सूख गया है | इस कारण वे पैसों के एवज़ हर उस चीज़ को खरीदने पर आमादा हैं जिसमें पानी है | और सरकारें अपनी तरह से इस व्यापार में हत्यारों की सरकारी गवाह बन चुकी हैं | मेरे इस सपने में जो बिना किसी स्टिंग ऑपरेशन के मूर्त है, मुझे आकंठ घेर लेता है डर में | मैं चीखना चाहता हूँ और आवाज़ जैसे गले में अटकी | सपना मुझे लिए भागता है चौतरफ | और मैं देखता हूँ वो सब जो कभी देखा नहीं | और इस तरह तो बिल्कुल नहीं | कि मेरी आत्मा लहूलुहान |



















(दो)
मैं तो बंधक उनका | हालाँकि यह तो स्वप्न में | मैं उनके पीछे भागता | कि जान सकूँ वह सच जो जीवन भर भारी बहोत | पानी कम होता हुआ गिरवी कहीं | उसके लिए मैं दौड़ता हूँ कि वह कितना बचा याकि बच जायेगा | संततियों की संभार के लिए | मैं उतरता हूँ एक माँ की कोख में | वहाँ एक भ्रूण है | अपने भार के तिरसठ प्रतिशत पानी में | उसी से जीवित वह | मैं कैसे जानूँ कि वह उसी मात्रा में है | और बच जायेगा सुरक्षित | अगर पानी कम हुआ | तो वह बचा हुआ होगा कितना कि जब जन्म लेगा | मैं उतरता हूँ अब अपनी देह में | वहाँ उसे होना चाहिए दो-तिहाई या तीन-चौथाई | और रक्त के प्लाज़मा में चार प्रतिशत होना जरूरी है | और कोशिकाओं में सोलह प्रतिशत | क्या इतना पानी सही-सही मात्रा में होगा | इधर अनेक बीमारियों से घिरा मैं, अब स्वप्न में हूँ डॉक्टर की टेबल पर | वह जाँच करता है और पर्ची में हिदायत लिखता है | मोटे अक्षरों में वह 'शुद्ध पानी' के सेवन पर ज़ोर डालता है यह जानते हुए कि वह सिर्फ प्रदूषित | बाज़ार के दावों को गले लगाए, मैं दौड़ता हूँ शुद्ध पानी के लिए | और झूठ पर एतबार करता हूँ कि जो सच की तरह परोसा गया | कि उसमें अकूत व्यापार | बस शुद्ध का विज्ञापन है अशुद्ध | पानी में वह होगा, ये भरोसा नहीं कर पाता और भय से काँपने लगता हूँ |

[लीलाधर मंडलोई सुपरिचित कवि व आलोचक हैं, जिनकी गद्य व पद्य की अनेकों पुस्तकें प्रकाशित हैं | यहाँ उनकी कविताओं के साथ दिए गए चित्र शैलेंद्र कुमार के मूर्तिशिल्पों के हैं | पूर्वी चंपारण में जन्में, खैरागढ़ विश्व विद्यालय में पढ़े शैलेंद्र ने अपने मूतिशिल्पों की तीन एकल प्रदर्शनियाँ की हैं तथा कई समूह प्रदर्शनियों में अपने मूर्तिशिल्पों को प्रदर्शित किया है |]

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