
|| बरसात का मतलब है / हो जाना दूर और अकेला ||
बरसात का मतलब है
हो जाना दूर और अकेला |
उतरती है साँझ तक बारिश -
लुढ़कती-पुढ़कती, दूरस्थ -
सागर-तट या ऐसी चपटी जगहों से
चढ़ जाती है वापस जन्नत तक
जो इसका घर है पुराना |
सिर्फ़ जन्नत छोड़ते वक्त गिरती है बूँद-बूँद बारिश
शहर पर |
बरसती हैं बूँदें चहचहाते घंटों में
जब सड़कें अलस्सुबह की ओर करती हैं अपना चेहरा
और दो शरीर
लुढ़क जाते हैं
कहीं भी हताश -
दो लोग जो नफ़रत करते हैं
एक-दूसरे से
सोने को मजबूर होते हैं साथ-साथ |
यही वह जगह है
जहाँ
नदियों से हाथ मिलाता है
अकेलापन |

|| दुनिया बड़ी है उस शब्द की तरह ||
जो भी तुम हो : शाम को निकलो
अपना कमरा छोड़ कर -
वहाँ जहाँ सब-कुछ जाना-चीन्हा हो,
उस दूरी और तुम्हारे बीच -
खड़ा है तुम्हारा मकान |
देहली छेंके हुए बैठी
थकी-थकी आँखों से -
तुम उठा लेते हो
एक काला पेड़ :
दुबला, अकेला,
और उसे आकाश से टिका देते हो |
इसी तरह खड़ी किया करते हो तुम
एक दुनिया नई |
और यह दुनिया बड़ी है
उस शब्द की तरह
जो शांति से पक रहा है |
जैसे ही तुम्हारी अभीप्सा
शब्द का निकालती है मतलब
धीरे-से टपका देती हैं
उसे तुम्हारी आँखें |

|| फूलों को देखो ||
फूलों को देखो, वे वफादार हैं धरती के -
हम किस्मत के अंत के छोर से
उनको क़िस्मत बख्शते हैं !
पर शायद उनको होता हो अफ़सोस
अपने बिखरने के ढंग का |
या शायद हम ही हों उनके अफ़सोस का
मूल कारण |
सब चीज़ें चाहती हैं तिरना | और हम बोझ की तरह
बँटते हैं - टिकते हुए सारी चीज़ों पर -
भारोन्मत्त |
कैसी माशाअल्ला शिक्षक हैं चीज़ें भी -
जबकि चीज़ों को है वरदान
हरदम ही बच्चा बने रहने का |
यदि कोई उन्हें गहन निद्रा में ले जाए,
और उनके साथ जमके सो जाए - कितना हल्का-हल्का
महसूस वह करेगा उठने पर -
बदला हुआ होगा वह, बदले हुए होंगे उसके दिन -
अंतःसंवाद से
गुज़रने के बाद |
या हो सकता है - वह ठहरे, और वे खिलें |
और कर दें बड़ाई - बदले हुए शय की |
नन्हे-नन्हे भाई-बहनों के साथ
घाटियों, हवाओं में रहते हैं
मिल-जुलकर ये |

|| उत्सवों ने खो दिए हैं अपने अंतिम संशय ||
प्रशंसा-वशंसा से
दुःख को गुज़र जाना चाहिए |
वह जलीय आत्मा आँसू के झील की :
दरगुज़र करती है चूकें हमारी ....
निश्चित यह करने की ख़ातिर कि पानी
उसी एक चट्टान से साफ़ उठता है, जिससे कि दबे पड़े हैं
सारे दरवाज़े और पूजावेदियाँ भीमकाय |
तुम देख सकते हो, उसके स्थिर कंधों के आस-पास ....
एक हूक उठती है ....
एक एहसास-सा घुमड़ता है
कि हमारे भीतर की तीन बहनों में
छोटी है सबसे वह !
उत्सवों ने खो दिए हैं अपने अंतिम संशय,
और कामना अपनी भूलों पर चिंतन करती है |
सिर्फ़ तकलीफ़ सीखती है अपना पाठ अब तक :
रात-भर वह अपने छोटे हाथों से गिनती है
अपनी ओछी विरासतें |
हैं विचित्र लेकिन वे मजबूर करती हैं हमको
आकाश के तारों की तरह, गुच्छों में -
साँसों की धार के परे !
[जर्मन कवि रिल्के (1875-1926) विश्व की प्रथम पंक्तियों के कवियों में अन्यतम हैं | यहाँ प्रस्तुत उनकी कविताओं का अनुवाद हिंदी की सुपरिचित कवयित्री अनामिका ने किया है | रिल्के की कविताओं के साथ दिये गए चित्र दिव्या गोयल की पेंटिंग्स के हैं | हरियाणा के अपेक्षाकृत एक छोटे शहर कैथल में जन्मी-पली दिव्या को कला का संस्कार अपनी माँ से मिला, जिसके चलते उन्होंने स्कूली पढ़ाई के दौरान ही चित्रकार बनने का निश्चय किया | अपने निश्चय को पूरा करने के लिए ही दिव्या ने कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से फाईन ऑर्ट में एमए किया | दिव्या ने कुछेक समूह प्रदर्शनियों में अपनी पेंटिंग्स को प्रदर्शित किया है तथा अपनी पेंटिंग्स की एक एकल प्रदर्शनी भी की है |]