Thursday, June 30, 2011

प्रेमशंकर शुक्ल की कविताएँ



















|| काग़ज़ ||

काग़ज़ जिसमें स्पंदित है
वनस्पतियों की आत्मा
आकाश जितना सुंदर है

जैसे शब्दों के लिए है आकाश
काग़ज़ भी वैसे ही

स्याही से उपट रहा जो अक्षरों का आकार
काग़ज़ पूरी तन्मयता से
रहा सँवार

जीवन की आवाज़ों-आहटों, रंगत
और रोशनी से भरपूर इबारतें
काग़ज़ पर बिखरी हैं चहुँओर
धरती में घास की तरह

और उन्हें धरती की तरह काग़ज़
कर रहा फलीभूत |



















|| नीली स्याही ||

नीली स्याही में
भीगे हुए हैं
कितने रंग के दुःख
कितनी उदासी-टूटन-हताशा,
पीड़ा और प्रेम
नीली स्याही में है
गुंजायमान
(जिसका कि सिर्फ़ नीला रंग नहीं है)

पंक्तित इस नीलाभ में
शामिल है
कितने तरह की चीज़ों की आवाज़
और चुप्पी

आखिर
नीला ही कितना बचा होगा
नीली स्याही में
जब उड़-सिकुड़ रही हो रंगत
जीवन से लगातार

[प्रेमशंकर शुक्ल की कविताओं के साथ दिए गए चित्र विक्रम नायक की पेंटिंग्स के हैं | बहुमुखी प्रतिभा के धनी विक्रम नाटकों व टेलीविजन धारावाहिकों में भी काम कर चुके हैं और एक चित्रकार के रूप में अपनी पेंटिंग्स देश-विदेश में प्रदर्शित कर चुके हैं |]

Monday, May 9, 2011

पंकज राग की कविताएँ

















|| अभी वक्त है ||

मेरे बच्चे भींगे-भींगे से हैं
जितना पानी मेरे घर में है, उतने से ही मेरे बच्चे भींगे-भींगे से हैं
समय कच्चा है
मौसम फूला-फूला है
जो न है वह आग है
जो है वह इंद्रधनुष है
जो नहीं होगा वह निषिद्ध है
जो होगा वह सुंदर संसार है |

मेरे बच्चे मेरे सपनों के राजा हैं
मिठाइयों में लड्डू हैं
पिछवाड़े के बंद दरवाज़े और सामने की ईंटों के बीच
जो महफूज़ है, वह मेरा आँगन नहीं मेरे बच्चे हैं
जो दबे पाँव आता है
वह सन्नाटा नहीं रहता
क्योंकि मैं ज़ोर-ज़ोर से बोलता हूँ
जैसे रात की कहानी में मिट्ठू
जिसे मैं बूढ़ा नहीं होने देता
तोता, मैना, शेर, हाथी - और जंगल में सुख ही सुख |

रात की कहानी एक मिथक की निरंतरता है
एक घाट का पानी
घाट की हरी घास,
चाह के साथ करिश्मा
पूर्वाग्रह भरी विजय
कोई दावानल नहीं, कोई सूराख़ नहीं
सुरंगों की मिट्टी भी शुद्ध
वहाँ भी गंध सोंधी
आश्वस्त करती थपकियाँ
और भीनी-भीनी नींद |

अभी वक्त है उस रात के आने में
जब मेरे बच्चे इन मिथकों की खिड़कियाँ खोलेंगे
वह एक व्यस्क रात होगी
और मैं अगली सुबह बूढ़ा होकर उठूंगा |

पर अभी वक्त है
अभी तो मैं जवान हूँ
और मेरे बच्चे भींगे-भींगे से हैं |

















|| फूटने दो रंग ||

तुम एक अलहदा तस्वीर बन कर नहीं बोलोगी किसी दिन
मैं क्यों रंग तुममें भरूँ ?
रंग झीने नहीं होते
मन अधडूबा रहे,
फिर भी अकड़ जाते हैं रंग
रंग लौटते नहीं,
रंग चुक जाते हैं |

तुम भरी पूरी रहो, न रहो,
पर सलामत रहो
पराकाष्ठा या चरम पर न भी पहुँचो
पर निरन्तर रहो,
कालजयी नहीं, आत्मजयी बनो
ऐसे ही हिलोरती रहो पर छिटको नहीं |

उगने दो गेहूँ की बालियों को
फैलने दो वटवृक्ष, फूल, पौधे, बांस
फूटने दो रंग, चटकने दो गंध
होने दो सब गाढ़ा-गाढ़ा,
तुम यूँ ही मद्धम रहो |

रीतने दो काग़ज को
सुलगने दो आकृतियों को
बनने दो लाल, नीला, पीला प्रचंड
बढ़ता जाए ठाठ-बाठ, टंगता जाए रूप-रंग
बढ़ती जाए ज्योति उनकी
फूले फले धूप हवा, चढ़े वैभव, घेरे रहस्य
बने हुए श्वेत शुभ्र तुम तो बस पसार दो |

[इतिहास के विद्यार्थी और अध्यापक रहे पंकज राग ने भारतीय प्रशासनिक सेवा का रास्ता जरूर पकड़ा, लेकिन कविता से उनका जो रिश्ता बचपन में ही बन गया था वह नहीं छूटा | इतिहास और पुरातत्व में विशेष रूचि रखने वाले पंकज राग की कविताओं ने पिछले वर्षों में ध्यान आकृष्ट किया है | पंकज फिल्म संगीत के भी गंभीर अध्येता हैं | यहाँ प्रकाशित उनकी कविताओं के साथ दिए गए चित्र अतुल पडिया की पेंटिंग्स के हैं | अतुल पडिया ने वडोदरा के प्रतिष्ठित एमएस विश्वविद्यालय से विजुअल ऑर्ट में मास्टर्स किया है तथा कई एक प्रमुख जगहों पर अपनी पेंटिंग्स को प्रदर्शित किया है |]

Monday, April 25, 2011

रिल्के की कविताएँ



















|| बरसात का मतलब है / हो जाना दूर और अकेला ||

बरसात का मतलब है
हो जाना दूर और अकेला |

उतरती है साँझ तक बारिश -
लुढ़कती-पुढ़कती, दूरस्थ -
सागर-तट या ऐसी चपटी जगहों से
चढ़ जाती है वापस जन्नत तक
जो इसका घर है पुराना |

सिर्फ़ जन्नत छोड़ते वक्त गिरती है बूँद-बूँद बारिश
शहर पर |
बरसती हैं बूँदें चहचहाते घंटों में
जब सड़कें अलस्सुबह की ओर करती हैं अपना चेहरा
और दो शरीर

लुढ़क जाते हैं
कहीं भी हताश -
दो लोग जो नफ़रत करते हैं
एक-दूसरे से
सोने को मजबूर होते हैं साथ-साथ |
यही वह जगह है
जहाँ
नदियों से हाथ मिलाता है
अकेलापन |















|| दुनिया बड़ी है उस शब्द की तरह ||

जो भी तुम हो : शाम को निकलो
अपना कमरा छोड़ कर -
वहाँ जहाँ सब-कुछ जाना-चीन्हा हो,
उस दूरी और तुम्हारे बीच -
खड़ा है तुम्हारा मकान |
देहली छेंके हुए बैठी
थकी-थकी आँखों से -
तुम उठा लेते हो
एक काला पेड़ :
दुबला, अकेला,
और उसे आकाश से टिका देते हो |
इसी तरह खड़ी किया करते हो तुम
एक दुनिया नई |
और यह दुनिया बड़ी है
उस शब्द की तरह
जो शांति से पक रहा है |
जैसे ही तुम्हारी अभीप्सा
शब्द का निकालती है मतलब
धीरे-से टपका देती हैं
उसे तुम्हारी आँखें |















|| फूलों को देखो ||

फूलों को देखो, वे वफादार हैं धरती के -
हम किस्मत के अंत के छोर से
उनको क़िस्मत बख्शते हैं !
पर शायद उनको होता हो अफ़सोस
अपने बिखरने के ढंग का |
या शायद हम ही हों उनके अफ़सोस का
मूल कारण |
सब चीज़ें चाहती हैं तिरना | और हम बोझ की तरह
बँटते हैं - टिकते हुए सारी चीज़ों पर -
भारोन्मत्त |
कैसी माशाअल्ला शिक्षक हैं चीज़ें भी -
जबकि चीज़ों को है वरदान
हरदम ही बच्चा बने रहने का |
यदि कोई उन्हें गहन निद्रा में ले जाए,
और उनके साथ जमके सो जाए - कितना हल्का-हल्का
महसूस वह करेगा उठने पर -
बदला हुआ होगा वह, बदले हुए होंगे उसके दिन -
अंतःसंवाद से
गुज़रने के बाद |
या हो सकता है - वह ठहरे, और वे खिलें |
और कर दें बड़ाई - बदले हुए शय की |
नन्हे-नन्हे भाई-बहनों के साथ
घाटियों, हवाओं में रहते हैं
मिल-जुलकर ये |



















|| उत्सवों ने खो दिए हैं अपने अंतिम संशय ||

प्रशंसा-वशंसा से
दुःख को गुज़र जाना चाहिए |
वह जलीय आत्मा आँसू के झील की :
दरगुज़र करती है चूकें हमारी ....
निश्चित यह करने की ख़ातिर कि पानी
उसी एक चट्टान से साफ़ उठता है, जिससे कि दबे पड़े हैं
सारे दरवाज़े और पूजावेदियाँ भीमकाय |
तुम देख सकते हो, उसके स्थिर कंधों के आस-पास ....
एक हूक उठती है ....
एक एहसास-सा घुमड़ता है
कि हमारे भीतर की तीन बहनों में
छोटी है सबसे वह !
उत्सवों ने खो दिए हैं अपने अंतिम संशय,
और कामना अपनी भूलों पर चिंतन करती है |
सिर्फ़ तकलीफ़ सीखती है अपना पाठ अब तक :
रात-भर वह अपने छोटे हाथों से गिनती है
अपनी ओछी विरासतें |
हैं विचित्र लेकिन वे मजबूर करती हैं हमको
आकाश के तारों की तरह, गुच्छों में -
साँसों की धार के परे !

[जर्मन कवि रिल्के (1875-1926) विश्व की प्रथम पंक्तियों के कवियों में अन्यतम हैं | यहाँ प्रस्तुत उनकी कविताओं का अनुवाद हिंदी की सुपरिचित कवयित्री अनामिका ने किया है | रिल्के की कविताओं के साथ दिये गए चित्र दिव्या गोयल की पेंटिंग्स के हैं | हरियाणा के अपेक्षाकृत एक छोटे शहर कैथल में जन्मी-पली दिव्या को कला का संस्कार अपनी माँ से मिला, जिसके चलते उन्होंने स्कूली पढ़ाई के दौरान ही चित्रकार बनने का निश्चय किया | अपने निश्चय को पूरा करने के लिए ही दिव्या ने कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से फाईन ऑर्ट में एमए किया | दिव्या ने कुछेक समूह प्रदर्शनियों में अपनी पेंटिंग्स को प्रदर्शित किया है तथा अपनी पेंटिंग्स की एक एकल प्रदर्शनी भी की है |]

Sunday, April 10, 2011

रीता सिंह की कविताएँ



















|| नन्ही-सी पकड़ ||

उस
नन्ही हथेली
की नन्ही अँगुलियों की
थरथराती ख़ामोशी की
हल्की-सी पकड़
कि तुम फिर आना
जबकि
जुबाँ पर होती चुभती चुप्पी
और चेहरा प्रतिक्रिया-विहीन
जबकि
आँखों के उस दायरे में
नहीं होता किसी रिश्ते का
अहसास
पर मुझे
छू लेती वह हल्की-सी पकड़
जो
कह रही होती कि
तुम फिर आना
जीवन की आपा-धापी में
हमेशा
गूँजा करता है मेरे आसपास
नन्ही-सी हथेली का
वह निमंत्रण
कि तुम फिर आना

पाकर वह निमंत्रण
उस नन्ही हथेली तक
पहुँच ही जाती हूँ मैं अक्सर
घंटों बैठते हम साथ
पकड़ एक-दूसरे का हाथ
तब ना ही वह कुछ कहती
और
ना उसकी नन्ही अँगुलियाँ
पर मेरे उठते-उठते
अचानक काँपती उसकी अँगुलियाँ
और हौले से रख देती पुनः अपना निमंत्रण
एक नई सरलता के साथ
जिसमें छुपा होता
अनगिनत
रिश्तों का हिसाब-किताब
कि
तुम फिर आना
कि
तुम
फिर
आना |



















|| सूर्यास्त का सूरज ||

मेरे ख़ामोश रहने को
तुम ग़लत न समझ लेना
शायद, मुझमें ही छुपा है
सूर्यास्त के बाद का सूरज

जो शाम ढलते ही
लोगों की नज़र में
सो जाता है, पर
एक नई सुबह के लिए
नई सृष्टि के लिए
तारों के देश में - 'वह'
निविड़ अकेला घूमकर
एक नई रोशनी और नई किरण को
लेकर
फिर सुबह उगता है
नवजीवन का पैगाम लेकर

मेरे ख़ामोश रहने पर
तुम्हारा
विजयघोष-विजयोन्माद
शायद तुमने ग़लत तो नहीं समझ लिया
पूरा का पूरा सागर गहराया है - मुझ में
बस रुकती हूँ तो
केवल उनके लिए
जो आज भी माचिस की तीलियों में,
सूरज का अहसास करते हैं
बस ख़ामोश रहती हूँ तो
उनके लिए
जिसने मुझे रिश्तों की
पहचान कराई है
जो मेरे चुप रहने का अर्थ समझते हैं
वक्त की चाल समझते हैं
मुझे कुछ कहने और करने से
रोकते हैं
मेरे ख़ामोश रहने का अर्थ
कुछ और न समझ लेना
बर्फ़ में
सनसनाती चीख़ती आँधी
की तरह हूँ मैं
जिस दिन चीख़ पड़ी
पूरा का पूरा
तुम्हारा
पहाड़नुमा साम्राज्य
भरभरा जाएगा
हिम गोलों की तरह
हिमस्खलन हो जाएगा

मेरे ख़ामोश रहने को
दहकते सूरज के नाम
तुम ग़लत न समझ लेना
सृष्टि की जटिलता के नाम
मेरे ख़ामोश रहने को
तुम ग़लत नाम न दे देना |



















|| कुछ पता नहीं ||

किस परिधि, किस हूरे नज़र
को ढूँढ़े है मेरा ये मन
कुछ पता नहीं |

कुछ पता नहीं
किस अनजाने सफ़र को ढूँढ़े है
मेरा ये मन |

किस प्रकाश कण किस मरुदान
को ढूँढ़े है मेरा मन
क्यों ढूँढ़े है उसे मेरा मन
कुछ पता नहीं |

झूम के बरसे अपनों के
प्यार की बदरी
तन तो गीला हो जाए
पर
मन तब भी सूखा रह जाए
कैसे - कुछ पता नहीं |

फूलों की पंखुड़ियों में
जीवन का रूप देखती हूँ
पक्षियों के झुण्ड में
एक अनुशासन देखती हूँ
पेड़ों की ख़ामोशी में
अर्द्धसुप्त ज्वालामुखी देखती हूँ
कैसे देख लेती हूँ
कुछ पता नहीं |

पता है तो सिर्फ़ इतना
कि ...
ख़ुद को इस जमीं पर
अकेला देखती हूँ
और पिछले मोम वाले चेहरों से
अलग हो कर
तन्हा ही रहना चाहती हूँ
क्यों ....?
कुछ पता नहीं |



















|| मुझे कुछ होता है ||

रोक लो, तुम
अँधेरों के बीच बहते
मुस्कान की धवल धारा को
मुझे - कुछ होता है

रोक लो, तुम
ज़िंदगी के पाटों में फँसे
मन की विरह-वेदना से बनते
बेल-बूटों की हरीतिमा को देख
मुझे कुछ होता है |

रोक लो, तुम
आस्था की गिरती दीवारों को
जो कुछ भी बचा है आज - अलभ्य है |
मुझे कुछ होता है |

बेशक
ये सभी
जीवाश्म की कणें हैं
पर रोक लो इसे तुम
दबी हैं इसमें अनुभवों की परतें
हमारे नन्हें कोंपल
के आएँगे काम
तमस को हटाने में |

रोक लो तुम इन्हें
बेशक ये मिट्टी के ढेले हैं
पर रोक लो इन्हें
मुझे कुछ होता है |

[भागलपुर (बिहार) में जन्मी तथा कुल्लू (हिमाचल प्रदेश) के राजकीय महाविद्यालय में अध्यापनरत रीता सिंह की कविताएँ प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने के साथ-साथ आकाशवाणी और दूरदर्शन से प्रसारित होती रही हैं | 'जाड़े की धूप' नाम से नई दिल्ली के अंतिका प्रकाशन ने उनका एक कविता संग्रह भी प्रकाशित किया है | रीता सिंह की कविताओं के साथ दिये गए चित्र राजस्थान स्कूल ऑफ़ ऑर्ट से पढ़े और अजमेर में रह रहे चित्रकार योगेश वर्मा की पेंटिंग्स के हैं | योगेश वर्मा कई समूह प्रदर्शनियों में अपनी पेंटिंग्स को प्रदर्शित कर चुके हैं तथा पिछले ही वर्ष चेन्नई व कोलकाता में अपनी पेंटिंग्स की एकल प्रदर्शनी कर चुके हैं | योगेश वर्मा कई संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरुस्कृत भी हुए हैं |]

Wednesday, March 30, 2011

अचला शर्मा की कविताएँ



















|| परदेश में बसंत की आहट ||

यहाँ कोई मुंडेर तो नहीं
ना ही वो आँगन
जिस के पार का आकाश
और नीला, और खुला लगता था
सुबह-शाम
भर जाया करता था
सैकड़ों चिड़ियों के वृंदगान से |
यह तो परदेस है
और हर मौसम प्रवासी
फिर भी ....
अचानक आज
एक अजनबी पंछी सीटी बजाता
मेरी गली से गुज़रा,
कि सामने के पेड़ ने चौंक कर
बिना कपड़े पहने ही
माथे पर लगा ली
नन्हीं-सी गुलाबी बिंदिया
धूप ने शरारत से आँख मारी
पड़ोसी के बच्चे ने राल-सने हाथों से
ऊनी मोज़ा उतारा
और फिर मारी ज़ोर से एक किलकारी
मेज़ पर रखी चिट्ठी
अधलिखी ही रह गई,
लगा, मौसम बादल गया |


















|| अब भी आते हैं सपने ||

कितना अच्छा है
कि अब भी आते हैं सपने
कुछ गहरी नींद में चलते
कुछ खुली आँखों में बहते
कुछ सुप्त और चेतन की संधि-रेखा पर
असमंजस की तरह झिझकते
पर अब भी आते हैं सपने |

बल्कि अक्सर आते हैं
जहाँ-जहाँ चुटकी काटते हैं
वहाँ-वहाँ भीतर का बुझता अलाव
फफोला बन उभर जाता है
देह का वो हिस्सा
जैसे मौत से उबर आता है
कितना अच्छा है
कि अब भी आते हैं सपने |

आते हैं
तो कुछ पल ठहर भी जाते है
चाहे मुसाफ़िर की तरह
लौट जाने के लिए आते हैं,
पर लौट कर कभी-कभी
चिट्ठी भी लिखते हैं
कहते हैं बहुत अच्छा लगा
कुछ दिन
तुम्हारी आँखों में बस कर
तुम ने आश्रय दिया
हमें अपना समझ कर,
आभार !

कितना अच्छा है
कि अब भी आते हैं सपने
धूप की तरह, पानी की तरह
मिट्टी और खाद की तरह
तभी तो
सफ़र का बीज
ऊँचा पेड़ हो गया है
छाँव भले कम हो
भरा-भरा हो गया है,
उस पर लटके हैं
कुछ टूटे, कुछ भूले, कुछ अतृप्त सपने
कुछ चुभते-से, दुखते-से
पराए हो चुके अपने,
फिर भी आते हैं सपने
कितना अच्छा है
कि अब भी आते हैं |

[ अचला शर्मा की कविताओं के साथ दिये गए चित्र ऋतु मेहरा की पेंटिंग्स के हैं | ऋतु की पेंटिंग्स की प्रदर्शनी नई दिल्ली की त्रिवेणी कला दीर्घा में चल रही है, जिसे छह अप्रैल तक देखा जा सकेगा | ]

Saturday, March 19, 2011

श्याम कश्यप की कविताएँ



















|| कन्याकुमारी का जादू ||

न सूर्योदय देख सके
न सूर्यास्त हम -
दो दिन कन्याकुमारी में

धुआँधार बरसते पानी के नीचे
सागर-लहरों की ऊँची उछाल....

एक के बाद एक जैसे
फिसलती -
चली आ रही हो
आसमान छूती
पानी की ठोस
धुँधली-पारदर्शी दर्शनीय दीवार |

तीन-तीन सागरों के महासंगम पर
एक लहर इधर एक उधर से प्रवेग
इन सबके ऊपर एक और .....

सामने से हिंद महासागर का ज़ोर
जैसे बाँहों में बाँहे फँसाये -
तीन महाबलियों के जूझने का शोर |

तीन महासागरों के संगम पर
मंत्रमुग्ध-से खोये रहे हम घंटों
त्रिकाल-बोध के कमान से छूटे
तीखे तीर-से अनंत में -

बाँध लेता है ऐसे ही
जाल में कस कर सभी को
अनोखा कन्याकुमारी का
ऐन्द्रजालिक जादू -

पिघलने लगता है आकाश
सवेग स्वर्ण-सरिता-सा
कविता की कंचन-धारा बन कर !















|| विवेकानंद शिला पर ||

विवेकानंद शिला से
देख रहे हम एकटक
तीन-तीन सागरों का
असीम विस्तार -
उछाल अनंत जलराशि की !

बंद कर लेना चाहते हैं
सीपियों में आँखों की
हिंद महासागर के सौंदर्य का
एक थिरकता उज्ज्वल मोती !

बायीं ओर बंगाल की खाड़ी
उद्वेलित लहरों के वेग से
रह-रह कर टकरातीं आकर जो
चट्टानों से जूझती .....

दूर दाहिने से
चला आ रहा
तूफ़ानी रेला
अरब सागर का दौड़ता .......

विशालकाय बाँहों में अपनी
दोनों को समेटता-समोता हिंद महासागर |

एक-दूसरे में घुलते-मिलते -
झिलमिल-झिलमिल अलग-अलग रंग
फिर एक ही विराट हरित नीलिमा में खो जाते-से !



















|| सागर मुद्राएँ ||

अनेक रंग
अनेक रूप
मुद्राएँ भी अनेक
देखीं समुद्र की
कई-कई दिन पांडिचेरी-तट पर

सुबह से शाम
कभी देर रात-रात तक
सुनहरा मटमैला कभी
और कभी धवला-सा
झाग-भरा फेन-भरा
नीला कभी हरा-हरा
कभी आँखों में सातों रंग घोलता

बाँहों में लेने को दौड़ता
कभी फिर पीछे ही लौटता
चट्टानों पर कभी सिर गुस्से से फोड़ता
कभी बस डोलता और नींद ही में बोलता
शांत कभी लेटा-लेटा बिस्तर पर लुढ़कता
कभी आकाश चूमने को बदली-संग खेलता |















|| समुद्र में आग ||

बेहद आकर्षित करता है
महाबलिपुरम के समुद्र का
गरजता-उफ़नता रौद्र रूप

तेज़ हवाओं की मथानी से
मथे जाते हुए जैसे -
फेन उगलता-उछलता चंचल सागर |

तट की चट्टानों पर
टूट कर बिखरीं
काँच की दीवार-जैसी ऊँची-ऊँची
अनवरत लहरों पर लहरें -

उगते सूरज की
स्वर्णिम लालिमा से
जल उठीं रँगकर -
अनगिनत लपकती ज्वाल-मालाएँ |

तट का एकाकी मंदिर
दिप-दिप उठा
आग फेंकती -
समुंदर की आतशी शीशे-जैसी लहरों से |

[ श्याम कश्यप की कविताओं के साथ दिये गए चित्र अनु धीर की पेंटिंग्स के हैं | इंदौर में जन्मीं और वहाँ के देवी अहिल्या विश्वविद्यालय में पढीं अनु देश विदेश में समकालीन भारतीय कला की एक प्रखर चितेरी के रूप में पहचानी जाती हैं | देश विदेश में अपनी पेंटिंग्स को प्रदर्शित कर चुकीं अनु की पेंटिंग्स देश के साथ साथ स्वीडन, फ्रांस, नीदरलैंड्स, कनाडा आदि में लोगों और संस्थाओं के पास संग्रहित हैं | मजे की बात यह है कि अनु ने चित्रकार बनने के बारे में कभी सचेत तरीके से सोचा भी नहीं था | एक कला संस्थान में एडमिशन लेने की अपनी कोशिश के असफल हो जाने का भी उन्होंने कोई अफसोस नहीं मनाया था | नौकरी और परिवार की जिम्मेदारियों का निर्वाह करते हुए उनकी कला अभिरुचि लेकिन स्वतः ही कैनवस पर ट्रांसफर होने लगी, और फिर उन्होंने पीछे मुड़ कर नहीं देखा | इस ब्लॉग पर लगाने के लिए पेंटिंग्स के फोटोग्राफ देने के हमारे अनुरोध को स्वीकार करते हुए अनु धीर ने बताया कि उनकी पेंटिंग्स का कॉपीराइट अधिनियम के तहत कॉपीराइट है, जिस कारण उनकी पेंटिंग्स को कॉपी और या पुनर्प्रदर्शित नहीं किया जा सकता | ]

Saturday, March 5, 2011

प्रयाग शुक्ल की कविताएँ

|| प्रेम : एक श्रृंखला ||















(एक)
पर्वत से लुढ़कने,
और फिर चढ़ने,
कहीं अधबीच में
एक चट्टान से उलझी हुई
शाखा को पकड़ने,
और फिर फिसलने के
क्रम में,
किसी फूल की सुगंध में -
कुछ देर विचरने का
अनुभव !

कलरव
चिड़ियों का |
घनी छाया का आश्वासन
अगले कदम पर |
एकदम निर्मल आकाश
में श्वास !















(दो)
दोनों किनारों के बीच
मँझदार
में एक नाव |
शांत निश्चल पल |
जल ही जल
चारों ओर |
धुँधलाता हुआ
हर तरफ का
शोर |
खुलती हुई
खिड़कियाँ
दिशाओं की !















(तीन)
नींद में एक मुख,
ढका हुआ
झीने वसन में,
झीना |
और उसके भीतर के
सपनों की तहें |
कुछ भी न कहें |
उसी अनजाने सुख
में रहें -
भीतर तक मौन !!















(चार)
चपल चंचल एक गति,
जैसा कि हिरण हवा में
अश्व एक,
पैरों को उठाये -
उड़ती चली जाती
चिड़िया
किसी घाटी में |

विद्युत तरंग |

दौड़ते चले आते
इसी ओर
कई-कई रंग |
फिर उनमें से
करता विलग
एक अपने को,
आ रहता सामने !















(पाँच)
एक मिली हुई निधि |
बार बार आ रहती
निकट | हर करवट |

कोई विधि
जिससे थम जाता है जलधि -
और फिर उठता है
ज्वार !!
अपार !

[प्रयाग शुक्ल की कविताओं के साथ दिये गए चित्र मुकेश मिश्र द्वारा खींचे गए फोटो हैं |]