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Sunday, April 10, 2011

रीता सिंह की कविताएँ



















|| नन्ही-सी पकड़ ||

उस
नन्ही हथेली
की नन्ही अँगुलियों की
थरथराती ख़ामोशी की
हल्की-सी पकड़
कि तुम फिर आना
जबकि
जुबाँ पर होती चुभती चुप्पी
और चेहरा प्रतिक्रिया-विहीन
जबकि
आँखों के उस दायरे में
नहीं होता किसी रिश्ते का
अहसास
पर मुझे
छू लेती वह हल्की-सी पकड़
जो
कह रही होती कि
तुम फिर आना
जीवन की आपा-धापी में
हमेशा
गूँजा करता है मेरे आसपास
नन्ही-सी हथेली का
वह निमंत्रण
कि तुम फिर आना

पाकर वह निमंत्रण
उस नन्ही हथेली तक
पहुँच ही जाती हूँ मैं अक्सर
घंटों बैठते हम साथ
पकड़ एक-दूसरे का हाथ
तब ना ही वह कुछ कहती
और
ना उसकी नन्ही अँगुलियाँ
पर मेरे उठते-उठते
अचानक काँपती उसकी अँगुलियाँ
और हौले से रख देती पुनः अपना निमंत्रण
एक नई सरलता के साथ
जिसमें छुपा होता
अनगिनत
रिश्तों का हिसाब-किताब
कि
तुम फिर आना
कि
तुम
फिर
आना |



















|| सूर्यास्त का सूरज ||

मेरे ख़ामोश रहने को
तुम ग़लत न समझ लेना
शायद, मुझमें ही छुपा है
सूर्यास्त के बाद का सूरज

जो शाम ढलते ही
लोगों की नज़र में
सो जाता है, पर
एक नई सुबह के लिए
नई सृष्टि के लिए
तारों के देश में - 'वह'
निविड़ अकेला घूमकर
एक नई रोशनी और नई किरण को
लेकर
फिर सुबह उगता है
नवजीवन का पैगाम लेकर

मेरे ख़ामोश रहने पर
तुम्हारा
विजयघोष-विजयोन्माद
शायद तुमने ग़लत तो नहीं समझ लिया
पूरा का पूरा सागर गहराया है - मुझ में
बस रुकती हूँ तो
केवल उनके लिए
जो आज भी माचिस की तीलियों में,
सूरज का अहसास करते हैं
बस ख़ामोश रहती हूँ तो
उनके लिए
जिसने मुझे रिश्तों की
पहचान कराई है
जो मेरे चुप रहने का अर्थ समझते हैं
वक्त की चाल समझते हैं
मुझे कुछ कहने और करने से
रोकते हैं
मेरे ख़ामोश रहने का अर्थ
कुछ और न समझ लेना
बर्फ़ में
सनसनाती चीख़ती आँधी
की तरह हूँ मैं
जिस दिन चीख़ पड़ी
पूरा का पूरा
तुम्हारा
पहाड़नुमा साम्राज्य
भरभरा जाएगा
हिम गोलों की तरह
हिमस्खलन हो जाएगा

मेरे ख़ामोश रहने को
दहकते सूरज के नाम
तुम ग़लत न समझ लेना
सृष्टि की जटिलता के नाम
मेरे ख़ामोश रहने को
तुम ग़लत नाम न दे देना |



















|| कुछ पता नहीं ||

किस परिधि, किस हूरे नज़र
को ढूँढ़े है मेरा ये मन
कुछ पता नहीं |

कुछ पता नहीं
किस अनजाने सफ़र को ढूँढ़े है
मेरा ये मन |

किस प्रकाश कण किस मरुदान
को ढूँढ़े है मेरा मन
क्यों ढूँढ़े है उसे मेरा मन
कुछ पता नहीं |

झूम के बरसे अपनों के
प्यार की बदरी
तन तो गीला हो जाए
पर
मन तब भी सूखा रह जाए
कैसे - कुछ पता नहीं |

फूलों की पंखुड़ियों में
जीवन का रूप देखती हूँ
पक्षियों के झुण्ड में
एक अनुशासन देखती हूँ
पेड़ों की ख़ामोशी में
अर्द्धसुप्त ज्वालामुखी देखती हूँ
कैसे देख लेती हूँ
कुछ पता नहीं |

पता है तो सिर्फ़ इतना
कि ...
ख़ुद को इस जमीं पर
अकेला देखती हूँ
और पिछले मोम वाले चेहरों से
अलग हो कर
तन्हा ही रहना चाहती हूँ
क्यों ....?
कुछ पता नहीं |



















|| मुझे कुछ होता है ||

रोक लो, तुम
अँधेरों के बीच बहते
मुस्कान की धवल धारा को
मुझे - कुछ होता है

रोक लो, तुम
ज़िंदगी के पाटों में फँसे
मन की विरह-वेदना से बनते
बेल-बूटों की हरीतिमा को देख
मुझे कुछ होता है |

रोक लो, तुम
आस्था की गिरती दीवारों को
जो कुछ भी बचा है आज - अलभ्य है |
मुझे कुछ होता है |

बेशक
ये सभी
जीवाश्म की कणें हैं
पर रोक लो इसे तुम
दबी हैं इसमें अनुभवों की परतें
हमारे नन्हें कोंपल
के आएँगे काम
तमस को हटाने में |

रोक लो तुम इन्हें
बेशक ये मिट्टी के ढेले हैं
पर रोक लो इन्हें
मुझे कुछ होता है |

[भागलपुर (बिहार) में जन्मी तथा कुल्लू (हिमाचल प्रदेश) के राजकीय महाविद्यालय में अध्यापनरत रीता सिंह की कविताएँ प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने के साथ-साथ आकाशवाणी और दूरदर्शन से प्रसारित होती रही हैं | 'जाड़े की धूप' नाम से नई दिल्ली के अंतिका प्रकाशन ने उनका एक कविता संग्रह भी प्रकाशित किया है | रीता सिंह की कविताओं के साथ दिये गए चित्र राजस्थान स्कूल ऑफ़ ऑर्ट से पढ़े और अजमेर में रह रहे चित्रकार योगेश वर्मा की पेंटिंग्स के हैं | योगेश वर्मा कई समूह प्रदर्शनियों में अपनी पेंटिंग्स को प्रदर्शित कर चुके हैं तथा पिछले ही वर्ष चेन्नई व कोलकाता में अपनी पेंटिंग्स की एकल प्रदर्शनी कर चुके हैं | योगेश वर्मा कई संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरुस्कृत भी हुए हैं |]

Sunday, July 4, 2010

अनीता वर्मा की कविताएँ



















|| चेहरा ||

इस चेहरे पर जीवन भर की कमाई दिखती है
पहले दुःख की एक परत
फिर एक परत प्रसन्नता की
सहनशीलता की एक और परत
एक परत सुन्दरता
कितनी किताबें यहाँ इकट्ठा हैं
दुनिया को बेहतर बनाने का इरादा
और खुशी को बचा लेने की ज़िद |

एक हँसी है जो पछतावे जैसी है,
और मायूसी उम्मीद की तरह |
एक सरलता है जो सिर्फ़ झुकना जानती है,
एक घृणा जो कभी प्रेम का विरोध नहीं करती

आईने की तरह है स्त्री का चेहरा
जिसमें पुरूष अपना चेहरा देखता है,
बाल सँवारता है मुँह बिचकाता है
अपने ताकतवर होने की शर्म छिपाता है

इस चेहरे पर जड़ें उगी हुई हैं
पत्तियाँ और लतरें फैली हुई हैं
दो-चार फूल हैं अचानक आयी हुई खुशी के
यहाँ कभी-कभी सूरज जैसी एक लपट दिखती है
और फिर एक बड़ी सी खाली जगह |



















|| कहीं और ||

मनुष्य की पूरी कथा
जीवन से छल की कथा है
बहुत दूर प्रकट होते हैं इसके सरोवर
उनमें खिले दुर्लभ कमल
बहुत दूर रहते हैं इसके अदृश्य पहाड़
हरियाली और ढलानें
कहीं और बसता है सुबह का आलोक
बीरबहूटियों की लाल रेशमी कतार

कोई तारा पहुँच के ऊपर
शांत चमकता है
ठंडी रेत पर प्यार और धूप के बिना
ज़हर के पौधे पनपते हैं
बंदूकों के घोड़े बजते हैं कानों में
सूरज हलकान पक्षी की तरह
गिरता है नदी की गोद में
सो गई हैं समुद्र की मीठी मछलियाँ
पृथ्वी जैसे काले जादू बाज़ार की पिटारी |



















|| खोज ||

जितना जिया जाता है जीवन
उतने खतरों को पीछे छोड़ चुका होता है
उसके हाथ समय के भीतर प्रकट होते हैं
किसी झाड़ियों वाली पगडंडी पर

काँटों से बनी हुई है यह देह
जिसकी ताकत का अंदाज़ा लगाना अब भी कठिन है
वह छीन लेती है खुशी का कोई पल
जैसे यही हो सृष्टि की पहली खोज

सभी अकेले हैं
एक गोल घेरे में करते हुए क़वायद
जहाँ वे अपनी ढालें खोजते हैं
वे छिपते हैं शांति या संघर्ष के पीछे
एक पहाड़ पूछता है दूसरे पहाड़ का दुःख
एक विचार अपने ही बोझ से दबा हुआ रहता है
यहां कोई खिड़की नहीं है
फिर भी खुला रह जाता है कोई न कोई दरवाज़ा |



















|| शांत रात ||

मैं पहाड़ी हवा थी
बादलों के नीचे पत्तों की गोद में बहती हुई
नीली रोशनी पर सवार
पानी में अपने पैर टिकाये रहती थी |

गाती थी मूँगे और पंखों के गीत
सफ़ेद घोड़ों के अयाल सहलाती
किसी पुरानी गुफा की आँच में डूबी
हाथ की अँगूठी चुम्बनों की बनी हुई |

अब जबकि कोई नहीं है मेरे साथ
बंटी हुई है वह हवा दो खण्डों में पूर्वी और पश्चिमी
मधुमक्खियों ने बिखेर दिया है सारा शहद
समुद्र से उड़ती रहती है भाप और बादल नहीं बनता
समय के पैरों में चकाचौंध की बेड़ियाँ हैं
मैं देखती हूँ अपने उत्सव की नदी को
बहते हुए इस शांत रात में



















|| तभी ||

जब पहाड़ और झीलें तरंगित होने लगें समुद्रों में
पेड़ चिड़ियों के मित्र बन जाएँ
और उन्हें काटने की कुल्हाड़ियाँ बननी बंद हो जाएँ
दुनिया भर की बंदूकें किसी अतल में दफना दी गई हों
फौजी बूटों के मिट जाएँ कारखाने
बच्चों की हँसी से दमक उठें युवाओं के चेहरे
पृथ्वी बीजों का उत्साह गाने लगे
थकान और पसीने से भरी हो मिट्टी
कलुष और ईर्ष्या मरें अपने ही विष से
तभी मैं जागूँगी
धूप रोशनी और प्रेम के बीच
आऊँगी इस दुनिया में

[ अनीता वर्मा की यहाँ प्रस्तुत कविताओं के साथ प्रकाशित चित्र प्रखर युवा चित्रकार मुकेश साल्वी की पेंटिंग्स के हैं | अगस्त 1984 में जन्में मुकेश साल्वी ने जयपुर स्थित राजस्थान स्कूल ऑफ ऑर्ट से पहले बीएफए और फिर एमएफए किया है तथा अपने चित्रों को जयपुर, उदयपुर, कोटा, भोपाल, अहमदाबाद, बंगलौर, चेन्नई और मलयेशिया में प्रदर्शित किया है | छात्र जीवन में तथा उसके बाद उन्होंने कई पुरुस्कार व सम्मान प्राप्त किये हैं, और उन्हें कई एक कला-वर्कशाप में आमंत्रित किया गया है | ]