Thursday, August 18, 2011

सुभाष मुखोपाध्याय की दो कविताएँ














|| धूप में रखूँगा ||

हम उमरदराज़ लोग
क्यों बार-बार
घर लौट कर आँखें पोंछते हैं,
वह विस्मित लड़की सोचती है -
हम ज़रूर रो रहे हैं !
यदि नहीं
तो हमारी आँखें नम क्यों हैं ?
भोली लड़की !
हम कैसे समझाएँ
कभी-कभी आँखों के कुएँ के पानी में
रुलाई नहीं, जलन पैदा होती है,
भोली लड़की !
गीली लकड़ी को फूँकने से आग नहीं सुलगती
धुएँ के गुबार में जलती हैं आँखें,
जहाँ भी देखो सिर्फ धुआँ ही धुआँ !
जलती आँखें ले हम बाहर आते हैं
पोंछते हैं आँखें -
तभी तो हमारी आँखें नम रहती हैं

जीवन का यह हाल यूँ तो वर्ष-भर नहीं
केवल बारिश के कुछ माह ....
फिर
सूखी लकड़ियों की धधकती आग में
खदकेंगे चावल के दाने
तब तो जहाँ है - ठीक-ठाक
हम साफ़-साफ़ देख सकेंगे
वर्षा के बाद लकड़ी, कोयला, भीगा सब कुछ
हम धूप में रख देंगे

धूप में रख देंगे
यहाँ तक कि ह्रदय भी !!














|| मैं आ रहा हूँ ||

मैंने आसमान की ओर देखा
वहाँ तुम्हारा चेहरा था
मैंने बंद की आँखें
वहाँ तुम्हारा चेहरा था
वज्र को बहरा कर दे ऐसी आवाज़ में तुम मुझे पुकार रहे हो |

बच्चों की आवाज़ में
दिन और रात के टुकड़े - टुकड़े कर
कौन रो रहे हैं ?
मौत के आतंक में जीवन से लिपट कर
कौन रो रहे हैं |
और इसीलिए
वज्र को बहरा कर देने वाली आवाज़ में
तुम मुझे पुकार रहे हो |

मैं आ रहा हूँ -
दोनों हाथों से अँधेरे को ठेलते-ठेलते
आ रहा हूँ मैं |

किसने संगीनें तान रखी हैं ? ....हटाओ |
कौन खड़ी कर रहा है रुकावटों की दीवारें ? ... तोड़ो |
सारी धरती के लिए मैं लेकर आ रहा हूँ
न रोकी जा सकने वाली अनोखी शांति |

[सुभाष मुखोपाध्याय की मूल बंगला में लिखी इन कविताओं का अनुवाद उत्पल बैनर्जी ने किया है | कविताओं के साथ दिए गए चित्र रमेश झावर की पेंटिंग्स के हैं |]


Friday, August 12, 2011

लीलाधर मंडलोई की एक गद्य कविता

|| हत्यारे उतर चुके हैं क्षीरसागर में ||



















(एक)
मैं रोज़ सोता था सुकून की नींद | और अब जागता हूँ जैसे नींद में | भयावह सपनों में डूबी हैं रातें | मैं हत्यारों को देखता हूँ सपनों में | उनके चेहरे अमूर्त हैं | बस उनका होना परिचितों-सा लगता है | वे बनक-ठनक में सभ्य संभ्रांत दीखते हैं | उनके पास भव्य मोटरें हैं | वे अमूमन बड़ी-बड़ी कोठियों से निकलकर आते हैं | उनके पीछे चलने वालों की जमात है | जो नई-नई शक्ल में हर जगह उपस्थित हैं | वे हथियारों से लैस हैं | उनकी आत्मा का पानी सूख गया है | इस कारण वे पैसों के एवज़ हर उस चीज़ को खरीदने पर आमादा हैं जिसमें पानी है | और सरकारें अपनी तरह से इस व्यापार में हत्यारों की सरकारी गवाह बन चुकी हैं | मेरे इस सपने में जो बिना किसी स्टिंग ऑपरेशन के मूर्त है, मुझे आकंठ घेर लेता है डर में | मैं चीखना चाहता हूँ और आवाज़ जैसे गले में अटकी | सपना मुझे लिए भागता है चौतरफ | और मैं देखता हूँ वो सब जो कभी देखा नहीं | और इस तरह तो बिल्कुल नहीं | कि मेरी आत्मा लहूलुहान |



















(दो)
मैं तो बंधक उनका | हालाँकि यह तो स्वप्न में | मैं उनके पीछे भागता | कि जान सकूँ वह सच जो जीवन भर भारी बहोत | पानी कम होता हुआ गिरवी कहीं | उसके लिए मैं दौड़ता हूँ कि वह कितना बचा याकि बच जायेगा | संततियों की संभार के लिए | मैं उतरता हूँ एक माँ की कोख में | वहाँ एक भ्रूण है | अपने भार के तिरसठ प्रतिशत पानी में | उसी से जीवित वह | मैं कैसे जानूँ कि वह उसी मात्रा में है | और बच जायेगा सुरक्षित | अगर पानी कम हुआ | तो वह बचा हुआ होगा कितना कि जब जन्म लेगा | मैं उतरता हूँ अब अपनी देह में | वहाँ उसे होना चाहिए दो-तिहाई या तीन-चौथाई | और रक्त के प्लाज़मा में चार प्रतिशत होना जरूरी है | और कोशिकाओं में सोलह प्रतिशत | क्या इतना पानी सही-सही मात्रा में होगा | इधर अनेक बीमारियों से घिरा मैं, अब स्वप्न में हूँ डॉक्टर की टेबल पर | वह जाँच करता है और पर्ची में हिदायत लिखता है | मोटे अक्षरों में वह 'शुद्ध पानी' के सेवन पर ज़ोर डालता है यह जानते हुए कि वह सिर्फ प्रदूषित | बाज़ार के दावों को गले लगाए, मैं दौड़ता हूँ शुद्ध पानी के लिए | और झूठ पर एतबार करता हूँ कि जो सच की तरह परोसा गया | कि उसमें अकूत व्यापार | बस शुद्ध का विज्ञापन है अशुद्ध | पानी में वह होगा, ये भरोसा नहीं कर पाता और भय से काँपने लगता हूँ |

[लीलाधर मंडलोई सुपरिचित कवि व आलोचक हैं, जिनकी गद्य व पद्य की अनेकों पुस्तकें प्रकाशित हैं | यहाँ उनकी कविताओं के साथ दिए गए चित्र शैलेंद्र कुमार के मूर्तिशिल्पों के हैं | पूर्वी चंपारण में जन्में, खैरागढ़ विश्व विद्यालय में पढ़े शैलेंद्र ने अपने मूतिशिल्पों की तीन एकल प्रदर्शनियाँ की हैं तथा कई समूह प्रदर्शनियों में अपने मूर्तिशिल्पों को प्रदर्शित किया है |]

Tuesday, August 2, 2011

नरेन्द्र जैन की कविताएँ



















|| इस वक्त ||

इस वक्त
पीली सुनहरी रोशनी है
मकान में फड़फड़ाती अकेली

दीवारों पर चीज़ों की आधी
परछाई डोलती है
कमीज़ की दो बाहें
शीशी के आसपास दुबका अंधकार

तस्वीरों की खामोश आकृतियाँ
डूबी अपने निर्जीव संसार में
बाहर मटमैले आसमान में भटके यात्री सा
आधा चाँद
आखिरी नज़र डालता है
सामने फैले अंधकार पर

कैसी है यह दुनिया
जो रोज़ जिए चली जाती है

कैसा है यह मिट्टी का दिया
जो फैलाता है
इस विध्वंस के बीच
पीली सुनहरी रोशनी

आह, आखिरी तिनके का सहारा
कितना मज़बूत है
चट्टान की तरह



















|| यहाँ से आगे ||

यहाँ से आगे
कहाँ जाऊँगा
कुछ पता नहीं

लेकिन जानता हूँ
यहाँ से आगे रास्ता
ज़िंदगी की ओर जाता है

वह
अस्तबल में हो सकती है
हो सकती है खेत की मेड़ पर
मुँह में बच्चे के
मीठे स्तन की मानिन्द
हो सकती है

मृत्यु के ऐन सामने
किलकारी की तरह

सच तो यह है
मैं इस समय इसलिए लिखता हूँ
कि मुझे ज़िंदगी का सरनामा मालूम है
और जानता हूँ
कि
पा ही लूँगा उसे मैं



















|| कहाँ-कहाँ नहीं होता हूँ ||

हवा का हल्का झोंका
मुझे बहाये लिए जाता है

कहीं न होते हुए भी
कहाँ-कहाँ नहीं होता हूँ

दृश्य की सीध में
देखो मुझे

बिजली की कौंध में
हादसों के स्पर्श में
बच्चे की स्मृतियों में देखो मुझे

यह नहीं होगा कि
चट्टान की तरह रहूँ
एक सूखे पत्ते की दिनचर्या
ज़्यादा सहज जान पड़ती है
एक पल हवा के साथ
एक पल आग के साथ

हवा का एक झोंका
बहाये लिए जाता है मुझे



















|| आलू ||

जब कुछ भी नहीं
हुआ करता
आलू ज़रूर होते हैं

जब कुछ भी न होगा
आलू होंगे ज़रूर

स्वाद से ज़्यादा
भूख से ताल्लुक रखते हैं
आलू

टुकड़ा भर आलू हो
तो पानीदार सब्ज़ी बना ही लेती हैं स्त्रियाँ

मिट्टी में दबे आलू
मिट्टी से बाहर आकर
प्रसन्न ही होते हैं

जब
आँच में भूने जाते हैं
भूखा आदमी कह उठता है
शुक्र है खुदा का
यहाँ आलू हैं

[नरेन्द्र जैन की कविताएँ उनके कई संग्रहों में तो संकलित हैं हीं, रूसी भाषा में भी अनुदित होकर प्रकाशित हो चुकी हैं | उन्होंने ख़ुद भी कविताओं, कहानियों व नाट्य-कृतियों के हिंदी अनुवाद खूब किए हैं | दो-ढाई दशक पहले उन्होंने 'अंततः' नाम की पत्रिका का संपादन भी किया था | 1948 में जन्मे नरेन्द्र जैन का आज जन्मदिन है | आधुनिक चित्रकला के प्रति गहरा रुझान रखने वाले नरेन्द्र की यहाँ प्रस्तुत कविताओं के साथ दिए गए चित्र मुक्ता गुप्ता की पेंटिंग्स के हैं | विश्व भारती यूनिवर्सिटी से एमएफए मुक्ता ने रांची, जमशेदपुर, पटना, भुवनेश्वर, धनबाद, ग्वालियर, उज्जैन आदि में आयोजित हुए कला-शिविरों में भाग लिया है तथा इन जगहों के साथ-साथ दिल्ली, कोलकाता, लखनऊ आदि में आयोजित हुई समूह प्रदर्शनियों में अपने काम को प्रदर्शित किया है | दिल्ली की ललित कला अकादमी की दीर्घा में पिछले करीब एक सप्ताह से चल रही एक समूह प्रदर्शनी में उनकी पेंटिंग्स को देखा जा सकता है | मुक्ता ने अपनी पेंटिंग्स की एक एकल प्रदर्शनी भी की है, और वह कई संस्थाओं से पुरस्कृत व सम्मानित हुई हैं |]

Friday, July 29, 2011

प्रमोद कुमार शर्मा की दो राजस्थानी कविताएँ



















|| फिर भी युद्ध ||

मैं जिन घाटियों में रहता हूँ
अक्सर देखता हूँ उनको
खिसकते हुए
इतनी अस्थिरता !

घर केवल अस्थिरता का नाम है
जिसे बाँधते रहते हैं हम
अक्षांश और देशांतर रेखाओं में !

ऐसा बंधन
फिर भी युद्ध !



















|| यह वक्त ||

यह भी कोई वक्त है ?
शब्द उतरने से करने लगे हैं इनकार
और आत्मा सूखकर
समुद्र से बन गई है बूँद
देश सो गया है
टीवी देखते-देखते
कौन पढ़ेगा कविता ?
यह भी कोई वक्त है कविता पढ़ने का ?

[हिंदी व राजस्थानी में कविता और कहानी लिखने वाले प्रमोद कुमार शर्मा की दोनों भाषाओँ में कई किताबें प्रकाशित हैं | यहाँ दी गईं दोनों कविताएँ मूल रूप में राजस्थानी में लिखी गई हैं, जिनका अनुवाद मदन गोपाल लढ़ा ने किया है | प्रमोद कुमार की कविताओं के साथ दिए गए चित्र हरेंद्र शाह की पेंटिंग्स के हैं | इंदौर के हरेंद्र शाह की पेंटिंग्स की प्रदर्शनी मुंबई की जहाँगीर ऑर्ट गैलरी में एक अगस्त से शुरू हो रही है, जिसे सात अगस्त तक देखा जा सकेगा |]

Sunday, July 24, 2011

गुलज़ार की चार कविताएँ



















|| देखो, आहिस्ता चलो ||

देखो, आहिस्ता चलो, और भी आहिस्ता ज़रा
देखना, सोच-सँभल कर ज़रा पाँव रखना
ज़ोर से बज न उठे पैरों की आवाज़ कहीं
काँच के ख़्वाब हैं बिखरे हुए तन्हाई में
ख़्वाब टूटे न कोई, जाग न जाये देखो

जाग जायेगा कोई ख़्वाब तो मर जायेगा |



















|| किताबें ||

किताबें झाँकती हैं बन्द अलमारी के शीशों से
बड़ी हसरत से तकती हैं
महीनों अब मुलाकातें नहीं होतीं
जो शामें इन की सोहबत में कटा करती थीं
अब अक्सर .......
गुज़र जाती हैं 'कम्प्यूटर' के पदों पर
बड़ी बेचैन रहती हैं किताबें ....
इन्हें अब नींद में चलने की आदत हो गई है
बड़ी हसरत से तकती हैं,
जो क़दरें वो सुनाती थीं,
कि जिनके 'सेल' कभी मरते नहीं थे
वो क़दरें अब नज़र आतीं नहीं घर में
जो रिश्ते वो सुनाती थीं
वह सारे उधड़े-उधड़े हैं
कोई सफ़ा पलटता हूँ तो इक सिसकी निकलती है
कई लफ़्ज़ों के मानी गिर पड़े हैं
बिना पत्तों के सूखे ठूँठ लगते हैं वो सब अल्फ़ाज़
जिन पर अब कोई मानी नहीं उगते
बहुत-सी इस्तलाहें हैं
जो मिट्टी के सकोरों की तरह बिखरी पड़ी हैं
गिलासों ने उन्हें मतरूक कर डाला
ज़ुबान पर ज़ायका आता था जो सफ्हे पलटने का
अब ऊँगली 'क्लिक' करने से बस इक
झपकी गुज़रती है
बहुत कुछ तह-ब-तह खुलता चला जाता है परदे पर
किताबों से जो ज़ाती राब्ता था, कट गया है
कभी सीने पे रख के लेट जाते थे
कभी गोदी में लेते थे,
कभी घुटनों को अपने रिहल की सूरत बना कर
नीम-सजदे में पढ़ा करते थे, छूते थे जबीं से
वो सारा इल्म तो मिलता रहेगा आइन्दा भी
मगर वो जो किताबों में मिला करते थे सूखे फूल
और महके हुए रुक्क़े
किताबें माँगने, गिरने, उठाने क़े बहाने रिश्ते बनते थे
उनका क्या होगा ?
वो शायद अब नहीं होंगे !



















|| ख़ुदा ||

पूरे का पूरा आकाश घुमा कर बाज़ी देखी मैंने
काले घर में सूरज रख क़े,
तुमने शायद सोचा था, मेरे सब मोहरे पिट जायेंगे,
मैंने एक चिराग़ जला कर,
अपना रस्ता खोल लिया

तुमने एक समन्दर हाथ में ले कर, मुझ पर ठेल दिया
मैंने नूह की कश्ती उसके ऊपर रख दी
काल चला तुमने और मेरी जानिब देखा
मैंने काल को तोड़ क़े लम्हा-लम्हा जीना सीख लिया

मेरी ख़ुदी को तुमने चन्द चमत्कारों से मारना चाहा,
मेरे इक प्यादे ने तेरा चाँद का मोहरा मार लिया -

मौत की शह दे कर तुमने समझा अब तो मात हुई,
मैंने जिस्म का ख़ोल उतार क़े सौंप दिया
और रूह बचा ली

पूरे-का-पूरा आकाश घुमा कर अब तुम देखो बाज़ी |















|| इक इमारत ||

इक इमारत
है सराय शायद,
जो मेरे सर में बसी है
सीढ़ियाँ चढ़ते-उतरते हुए जूतों की धमक
बजती है सर में
कोनों-खुदरों में खड़े लोगों की सरगोशियाँ
सुनता हूँ कभी |
साज़िशें, पहने हुए काले लबादे सर तक,
उड़ती हैं, भूतिया महलों में उड़ा करती हैं
चमगादड़ें जैसे |
इक महल है शायद !
साज़ के तार चटख़ते हैं नसों में
कोई खोल के आँखें,
पत्तियाँ पलकों की झपकाके बुलाता है किसी को !
चूल्हे जलते हैं तो महकी हुई 'गन्दुम' के धुएँ में,
खिड़कियाँ खोल के कुछ चेहरे मुझे देखते हैं !
और सुनते हैं जो मैं सोचता हूँ !

एक, मिट्टी का घर है
इक गली है, जो फ़क़त घूमती ही रहती है
शहर है कोई, मेरे सर में बसा है शायद !

[गुलज़ार की कविताओं के साथ दिए गए चित्र पदमाकर सनतपे की पेंटिंग्स के हैं | 1960 में जन्मे पदमाकर ने नागपुर से ऑर्ट की पढ़ाई की है और कई समूह प्रदर्शनियों में अपना काम प्रदर्शित करने के साथ-साथ उन्होंने अपनी पेंटिंग्स की कई एकल प्रदर्शनियाँ भी की हैं | चार दिन बाद, 28 जुलाई को पदमाकर का जन्मदिन है |]

Friday, July 15, 2011

नीलेश रघुवंशी की चार कविताएँ



















|| बिल्ली और रास्ता ||

टूटता जा रहा है धैर्य
बार-बार घड़ी में समय देखता
उकताहट और बेचैनी में टहलने लगा है
सड़क किनारे खड़ा आदमी
रह-रह कर जकड़ रहे हैं अंधविश्वास

कितने शुभ मुहूर्त में दही-गुड़ खाकर देहरी पार की थी
और तब तो बनते काम भी बिगड़ेंगे
इसलिए सड़क किनारे खड़ा आदमी
प्रतीक्षा में है कि पार कर जाए कोई उससे पहले रास्ता
अपने हिस्से की सारी मुसीबतें, भयावह अंदेशे और अपशगुन
किसी और के हवाले कर निकले फिर वह भी
बिल्लियाँ काटती हैं रास्ता बार-बार
और हँसती हैं आदमी पर |



















|| प्रार्थना ||

वे जो मुझे छलते हैं बार-बार
नदी की तरह बहती न जाऊँ उनके पास
छल से उनके उबरकर, खड़ी रह सकूँ पहाड़ों की तरह
गिरगिट की तरह बदलते उनके रंगों को, हर पल बदलती
विलाप में
रोती और झुक-झुक जाती फलों से भरी डगाल की तरह
दूध से निकली मक्खी की तरह दूर हो सकूँ उनसे
भर चुकी हूँ छल से उनके भीतर तक
प्रभु इतनी शक्ति दो मुझे कि उनके छल को ऊँगली पकड़ बाहर
करूँ
मुक्ति दो मुझे छल से
बल दो कि मेरा प्रेम बदलने न पाए छल में



















|| आधी रात के बाद की आवाज़ें ||

आधी रात के बाद की आवाज़ें
भर देती हैं वरहमेश दहशत से
कुत्ते और बिल्ली के रोने की आवाज से
मारे डर और आशंका के, दुबके रहते हैं कुछ देर हम बिस्तर में
आभास होता है हमसे ज्यादा उन्हें किसी भी अनिष्ट और भयावह
संकट का

तमाम आशंकाओं को परे धकेलते खिड़की से दुत्कारते पत्थर फेंकते
धकियाते उन्हें किसी और के दरवाज़े

आधी रात के बाद बज उठती है जब कभी टेलीफोन की घंटी
हड़बड़ाकर अकबका उठते हैं हम
सिरहाने रखा टेलीफोन साक्षात, यमदूत लगता है उस समय
काँपते मन और ठिठुरते ख्यालों से ताकते रहते हैं टेलीफोन को
बुरी ख़बर के अन्देशों से भरी आधी रात के बाद की आवाज़ें
क्योंकर इतनी डरावनी और भयावह होती हैं |



















|| बिना छप्पर के ||

निकलता झुंड जब भी गायों का बात ही निराली होती उसमें उसकी |
लंबी चौड़ी सफ़ेद झक्क काली-काली आँखें |
बुरी नज़र से बची रहे हमेशा गले में उसके रहता काला डोरा |
थन उसके भरे रहते हमेशा जरूरी नहीं छोड़ा जाए पहले बछड़े को |
बिना लात मारे भर देती भगोने पे भगोने |
लोग अचरज से भरे रहते हमेशा - दुधारू गाय वो भी बिना लात वाली |
हर एक ग्वाले का सपना - कजरारी आँखों और भरे थन वाली गाय |
खुले में घास चरते समय एक दिन
एक पागल कुत्ते ने काट लिया उसे |
दौरे पड़ने लगे गाय को दौड़ती फिरती इधर से उधर |
छकाती सबको बीच सड़क पर बैठ फुंफकारती |
एक मजबूत पेड़ से बीच मैदान में रस्से से बंधी है गाय |
बिना छप्पर के मरने के लिए छोड़ दिया उसे उन्होंने
दिया जिन्हें उसने कई-कई मन दूध बिना लात मारे |

[नीलेश रघुवंशी की कविताओं के साथ दिए गए चित्र अनिल गायकवाड़ की पेंटिंग्स के हैं | नीलेश और अनिल भोपाल में रहते हैं |]

Wednesday, July 6, 2011

मोहनकुमार डहेरिया की दो प्रेम कविताएँ



















|| मैं लौट आया ||

आखिर मैं लौट आया
मिल सकता था जहाँ मेरी तपती हुई आत्मा को सबसे गहरा सुकून
वहाँ पहुँचने के पहले ही
आखिर मैं लौट आया

यह वह जगह थी
दुःखों को जहाँ सीने पर तमगों सा सजना था
समाना था कामना की एक लपट को दूसरी लपट के जिस्म में
कर रही थी यहीं
समय की भयावह झाड़ियों के बीच
असंख्य पंखुड़ियों वाले विलक्षण फूल की तरह
वर्षों से एक लड़की मेरा इंतज़ार

कितना तो खुश था मैं
चल रहा था बहुत तेज-तेज
तभी धर्म के बहुत ऊँचे पहाड़ पर खड़े एक विदूषक ने घुमाई जादू
की छड़ी
मैंने देखा
अजगर की तरह जकड़ गया मेरे इरादों से मेरी माँ का आँचल
फड़फड़ाकर टूटने ही वाला है
पैरों के नीचे आकर पिता का झुर्रीदार चश्मा
दिखाई दिया मेरा अपना घर
जर्जर टिमटिमाती हुई रोशनी वाली लालटेन की तरह
कर रहा था वापस लौट आने का संकेत

थोड़ी दूर ही तो रह गई थी वह जगह
कि मैं लौट आया
मेरे ज़ख्मों को आनी थी जहाँ खूब गहरी नींद
और कंठ में फँसी एक चीख़ को तब्दील होना था एक बेहद सुंदर
राग में
वहाँ पहुँचने के पहले ही
आखिर मैं लौट आया |



















|| मुलाकात ||

कभी सोचा न था
इस तरह भी होगी मुलाकात
मिलती है जैसे किसी संगम पर एक नदी दूसरी नदी से
दिखाती हुई आपस में
एक लंबी बीहड़ यात्रा में सूजे हुए पैर
देह पर पड़े प्रदूषण के निशान

यह सच है
अलग-अलग हो चुके हमारे रास्ते
पिट चुके जीवन की बिसात पर सारे मोहरे
ज्यादा दूर नहीं पर वे दिन
मुझे देखते ही लाल सुर्ख़ हो जाती थी तुम्हारे कानों की कोर
झनझना उठते तुम्हारी आवाज से मेरे अंदर के तार
तब भी आते थे जीवन में हताशाओं के दौर
क्रूरता के उच्चतम शिखर पर पहुँच जाता कभी-कभी यातनाओं
का सूर्य
होती थी चूंकि एक दूसरे की बाँहों में बांहें
पार कर जाते अंतःशीतल हवा के झोंके सा
जीवन के सारे तपते हुए रास्ते
यह तो था कल्पना के बाहर
इस तरह भी थामेंगे एक दूसरे को कभी
थामती है जैसे एक ढहती हुई दीवार
दूसरी ढहती हुई दीवार को

सचमुच कितने सुंदर दिन थे वे
अभिसार की स्मृतियों से सनी हुई वे रातें
एक दूसरे का जरा सा स्पर्श
तेज कर देता शरीर में खून की गति
आज भी याद आती है
कामनाओं के क्षितिज पर अस्त होती तुम्हारी वह देह
और माथे पर अंकुरित होते पसीने के नन्हें-नन्हें चंद्रमा
दुःस्वप्न में भी न थी कभी आशंका
इस तरह भी संभव होगा कभी हमारे बीच प्रेम
लिपटा रहा हो जैसे झुलसी हुई पीठ वाला एक चुंबन
झुलसी हुई पीठ वाले दूसरे चुंबन से |

[केंद्रीय विद्यालय में अध्यापक मोहनकुमार डहेरिया प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े हुए हैं और उनके दो कविता संग्रह प्रकाशित हैं | यहाँ उनकी कविताओं के साथ दिए गए चित्र शिमला में जन्मे और दिल्ली में रह रहे युवा चित्रकार भानु प्रताप की पेंटिंग्स के हैं |]