Wednesday, March 14, 2012

मालविका कपूर की पेंटिंग्स के साथ अशोक वाजपेयी की चार कविताएँ



















|| उम्मीद चुनती है 'शायद' ||

उम्मीद चुनती है अपने लिए एक छोटा-सा शब्द
शायद -

जब लगता है कि आधी रात को
दरवाज़े पर दस्तक देगा वर्दीधारी
किसी न किए गए जुर्म के लिए लेने तलाशी
तब अँधेरे में पालतू बिल्ली की तरह
कोने में दुबकी रहती है उम्मीद
यह सोचते हुए कि बाहर सिर्फ हवा हो
शायद |

फूलों से दबे संदिग्ध देवता के सामने हो रही
कनफोड़ आरती, कीर्तन
और घी-तेल की चीकट गंध में
किसी भुला दिए गए मंत्र की तरह
सुगबुगाती है उम्मीद
कि शायद अधपके नैवेध्य और चिपचिपाती भक्ति के नीचे
बची रह गई हो थोड़ी-सी प्राचीन पवित्रता |

जब लगता है कि भीड़-भाड़ भरी सड़क पर
सामने से बेतहाशा तेज़ आ रहा बेरहम ट्रक
कुचलकर चला जाएगा
उस न-जाने-कहाँ से आ गई बच्ची को
तभी उम्मीद
किसी खूसट बुढ़िया की तरह
न-जाने-कहाँ से झपटकर
उसे उठा ले जाएगी
नियति और दुर्घटना की सजी-धजी दूकानों के सामान को
तितर-बितर करते हुए |

शायद एक शब्द है
जो बचपन में बकौली के नीचे खेलते हुए
अकस्मात झरा था फूल की तरह
शायद एक पत्थर जो खींचकर किसी ने मारा था
परीक्षा में अच्छे नंबर न पाने की उदासी पर
शायद एक खिड़की है जिससे देखा था
धूमिल होती जाती प्रियछवि को
शायद एक अनजली अस्थि है
जिसे मित्रशव को फूँकने के बाद
हम वहीं भूल गए
जहाँ चिता थी
और जिसे आज तक किसी नदी में सिरा नहीं पाए हैं |

उम्मीद ने चुना है
एक छोटा-सा पथहारा शब्द
'शायद |'



















|| वैसी पृथ्वी न हो पाने का दुःख ||

खिड़की के पास चुपचाप खड़ी होकर
देखती है पृथ्वी
कि कैसे बनाती है दूबी
अपनी छोटी-सी मेज़ पर
एक छोटी-सी कापी में
एक और छोटी-सी पृथ्वी |

एटलस से काटकर
कुछ भू-भाग
कुछ हरी दूब और सूखी वनस्पतियाँ
कुछ टुकड़े, पन्नियाँ चमकीली जमाकर
मेरी बेटी
गढ़ती है अपनी एक पृथ्वी
जो धड़कती है
बिना किसी मनुष्य के |

अपने गोलार्धों में
बँटी-फँसी पृथ्वी
कुछ पछतावे से सोचती है
क्यों नहीं बनाया
किसी ने उसे
वैसी ही पृथ्वी ?















|| अगर इतने से ||

अगर इतने से काम चल जाता
तो मैं जाकर बुला लाता देवदूतों को
कम्बल और रोटियाँ बाँटने के लिए |

बैठ जाता पार्क की बेंच पर,
एक अकेले उदास बूढ़े की तरह
होने के कगार पर,
और देखता रहता पतझर
चुपचाप ढाँकते पृथ्वी को |

चला जाता
उस बे-दरो-दीवार के घर में,
जिसे किसी बच्ची ने
खेल-खेल में
अपनी कापी में खींच रखा है |

ले जाता
अपनी गुदड़ी से निकालकर
एक पुरानी साबुत घड़ी का उपहार,
अस्पताल में पड़े बीमार दोस्त के लिए
ताकि वह काल से बचा रह सके |

आत्मा के अँधेरे को
अपने शब्दों की लौ ऊँची कर,
अगर हरा सकता
तो मैं अपने को
रात-भर
एक लालटेन की तरह जला रखता |

अगर इतने से काम चल जाता !














|| कितना बजा है ? ||

कितना बजा है ?
पूछता है सत्रहवीं शताब्दी के अँधेरे में
बुर्ज पर खड़ा एक चौकीदार
अपनी लालटेन की कम होती रोशनी में |
किसी यहूदी कवि की रचनाओं का
अनुवाद करने की कोशिश में बेहाल
भारी फ्रेम के चश्मेवाली लड़की पूछती है
मानो किसी प्राचीन ग्रंथ के
सर्वज्ञ नायक से -
कितना बजा है ?

थककर चूर हुआ दुर्दांत बूढ़ा देवता
जम्हाई लेता हुआ
चीखता है शून्य में -
कितना बजा है ?

कुँजड़िनों के झगड़ों से त्रस्त
और अपनी स्कूली पुस्तकें कहीं न पाने से दुखी
छतों की दुकान के सामने
पैसे न होने के बावजूद ललचाता हुआ एक बच्चा
जानना चाहता है एक मुस्तंड खरीदार से -
कितना बजा है ?

अपने जीवन की धुँध से घिरा
बचपन के मुबहम होते जाते चेहरों को
खोने के पहले याद करता हुआ
रक्त के मौन में कहीं
दूर से आ रही पुकार सुनता हुआ
मैं इसी अधबनी कविता से पूछता हूँ -
कितना बजा है ?

[लखनऊ स्थित ललित कला अकादमी के रीजनल सेंटर में कार्यरत मालविका कपूर ने बनारस हिंदु विश्वविद्यालय से पहले बीएफए और फिर एमएफए किया है | कई समूह प्रदर्शनियों में अपनी पेंटिंग्स प्रदर्शित कर चुकीं मालविका उत्तर प्रदेश ललित कला अकादमी से पुरस्कृत हैं तथा अभी हाल ही में मुंबई की जहाँगीर ऑर्ट गैलरी में उनकी पेंटिंग्स की एकल प्रदर्शनी आयोजित हुई है | उनकी पेंटिंग्स में दिखती रंगाभिव्यक्ति में जीवनानुभवों की उस सूक्ष्मता को महसूस किया जा सकता है जो वैचारिक सरलीकरण के बीच गुम से हो गए हैं | उनकी पेंटिंग्स के साथ प्रस्तुत कविताओं के रचयिता अशोक वाजपेयी समकालीन हिंदी कविता के क्षेत्र में अपना एक अलग स्थान रखते हैं |]

Thursday, September 8, 2011

ब्रज श्रीवास्तव की दो कविताएँ

















|| अँधियारा ||

अजीब दहशत सी है जब
अपने शहर के आने पर झाँकता हूँ बाहर ट्रेन से
वहाँ घुप्प अँधेरा है

भय का उदगम है ये अँधकार
न जाने क्या चीज़ किस चीज़ से
टकरा जाए बुरी तरह

यह वह अँधियारा है
जिसे सूरज छोड़ गया अपने आने तक
जो घर की छत से चिपका है
नदी किनारे रेत के कणों के बीच में
और गहरा गया है

ये दुनिया के बनने के पहले दिन से है
अस्तित्व में
इसका होना देर तक, अखरता है हमें
हम डरे हुए हैं दरअसल
अपनी बनाई चीज़ के मौजूद न होने पर

अँधियारा इसीलिए हुआ है भयानक आज
क्योंकि हमने कल तक इसे
अलग करके नहीं देखा
रोशनी से



















|| इस तलाश में ||

आँखों में सँजो लेना चाहता हूँ
खेत में बिछी काली मिट्टी की उर्वरता का तेज़

मोटर बस में सफ़र करते हुए
यह भी सोचता हूँ
सूरज की दमक
देती रहे एक पुंज ऐसे ही

दोस्तों की बातों में ही
खोज लेता हूँ
जीवन के हक़ में बोले जाने वाली बात

किसी पक्षी की तरह
इकट्ठा कर रहा हूँ
प्यार की बातों के तिनके

इस तलाश में
जिन चीज़ों को रद्द करता हूँ
वे अचरज से घूरती हैं मेरी ओर
और हँस पड़ती हैं
मेरे फ़ैसले पर

[ब्रज श्रीवास्तव की कविताओं के साथ दिए गए चित्र समकालीन कला परिदृश्य में अपनी खास पहचान बना रहे चित्रकार शाम पह्पलकर की पेंटिंग्स के हैं |]

Friday, September 2, 2011

वरवर राव की दो कविताएँ



















|| दुःखी कोयल ||

इस साल ख़ूब बरसा पानी
भर गए नदी नाले
पिछले दस सालों में
कोई भी ऋतु समय पर कहाँ आई थी ?
जेल में क़दम रखते ही
कोयल का स्वागत-गान सुनकर चकित हुआ
सोचा
क्या अभी से बसंत की ऋतु आ गई ?

निज़ाम-युग की दीवारें
कँटीले तार बिजली की मार
सेंट्री की मीनार
दीवारों के अंदर दीवारें
द्वार के अंदर द्वार
ताला लगाना ताला खोलना
पहरे के गश्तों के बीच कैद पड़ी हरियाली
न उड़ सकने वाले कबूतर
अहाते के अंदर बंदी-जैसा आसमान
नीरव दोपहर में 'अल्लाह-ओ-अक़बर' की गूँज
भीगी धरती को छूकर काँपने वाली हवा
सारी ऋतुएँ यहीं बंदी बनी हुई थीं अब तक
आम की कोंपलों और नीम के फूलों का
एक जैसा स्वाद
बेल्लि ललिता की तरह
जकड़ती ज़ंजीरों का गीत
गाता रहता है जेल का कोयल हमेशा
मैं आ गया हूँ शायद इसलिए
या दोस्त कनकाचारी नहीं रहा इसलिए |



















|| मैं हूँ एक अथक राहगीर ||

मैं एक अथक राहगीर हूँ
घुमक्कड़ हूँ
अँधेरी रातों में दामन फैला कर
आसमान से तारे माँगता रहता हूँ
चाँदनी रातों में
जंगल के पेड़ों से फूल माँगता रहता हूँ

आसमान और ज़मीन ने मुझसे कहा -
तारे टूटकर गिरते हैं तो मनुष्य बनते हैं
मनुष्य बड़े होकर लड़कर अमर होकर
आकाश के तारे बनते हैं
फूल धरती पर गिरकर बीज बनते हैं
बीज ही पेड़ बनकर हवा को पँखा झलते हैं
अपने लिए राह के लिए या दीन दुखियों के लिए
किसके लिए दौड़ रहे हो तुम
यह मालूम हो जाए
तो तुम माँग रहे हो या भीख चाहते हो
यह भी स्पष्ट हो जाएगा

मैं लंबी साँस खींच कर
छाती में प्राणवायु भरकर
निर्जीव उसाँस छोड़ता हूँ
फिर भी हवा चलती रहती है
बाँसों के झुरमुट में बाँसुरी बनकर

मैं अँजुरी में पानी भरकर पीता हूँ
लूट को छिपाकर रखता हूँ
सूखा और बाढ़ की सृष्टि करता हूँ
फिर भी
नदिया सुर बनकर
दरिया गीत बनकर
झरना साज बनकर
प्रवाह संगीत बनकर
बहता ही रहता है
धूप खिलकर
प्रकृति का सत्य प्रकट करती रहती है

समय में क्षण की तरह
अणु में परमाणु की तरह
सागर में बूँद की तरह
आग के गोले में चिंगारी की तरह
आगे पीछे
क़दम से क़दम मिलाते हुए
लड़खड़ाते हुए
बिना रुके चलोगे ...छलाँग लगाओगे ...
तभी इस राह में तुम एक चल बनोगे ...
यह कहकर हँसे धरती और ग़गन !

[प्रख्यात क्रांतिकारी तेलुगु कवि वरवर राव की मूल तेलुगु में लिखी इन कविताओं का अनुवाद आर. शांता सुंदरी ने किया है | कविताओं के साथ दिए गए चित्र मशहूर चित्रकार गोपी गजवानी की पेंटिंग्स के हैं |]


Friday, August 26, 2011

व्योमेश शुक्ल की चार कविताएँ















|| जानना ||

एक दिन कीड़ा काग़ज़ पर बैठा
लेकिन इस बैठने से कुछ समझ पाना असंभव था
इस तरह हल्का असंभव एक बार छोड़ कर चला गया वह मेरे लिए
मैं पतंग उड़ाना तैरना या हारमोनियम बजाना नहीं जानता हूँ
वैसे ही इस कुछ या बहुत कुछ को समझना या सोचना भी शायद नहीं जानता
हूँगा मैंने ख़ुद से कहा
एक जोड़ा आँसू के डब डब को तब समझ नहीं पाया था
ख़ुशी में रोने को समझता हूँ थोड़ा बहुत
अक्सर ख़ुशी को ही नहीं समझ पाता हूँ
रोना जानता हूँ
प्यार करना और पढ़ना दुनिया के सबसे कोमल और पवित्र काम हैं
निर्दोष हँसना अब शायद कोई नहीं जानता
तमाम काम यह एक बड़ा सच है कि तमाम लोग नहीं जानते
जानना हमेशा एक मुश्किल काम रहा



















|| कुछ देर ||

तुम्हारी दाहिनी भौं से ज़रा ऊपर
जैसे किसी चोट का लाल निशान था
तुम सो रही थी और वो निशान ख़ुद से जुड़े सभी सवालों के साथ
मेरी नींद में
मेरे जागरण की नींद में
चला आया है
इसे तकलीफ़ या ऐसा या ऐसा ही कुछ कह पाने से पहले
रोज़ की तरह
सुबह हो जाती है

सुबह हुई तो वह निशान वहाँ नहीं था
वह वहाँ था जहाँ उसे होना था
लोगों ने बताया : तुम्हारे दाहिने हाथ में काले रंग की जो चूड़ी है
उसी का दाग़ रहा होगा
या कहीं ठोकर लग गई हो हल्की
या मच्छर ने काट लिया हो
और ऐसे दागों का क्या है, हैं, हैं, नहीं हैं, नहीं हैं
और ये सब होता रहता है

यों, वो ज़रा सा लाल रंग
कहीं किसी और रंग में घुल गया है

हालाँकि तब से कहीं पहुँचने में मुझे कुछ देर हो जा रही है



















|| मैं जो लिखना चाहता था ||

आँख से अदृश्य का रिश्ता है
मुझे लगा है सारे दृश्य
अदृश्य पर पर्दा डालते हुए होते हैं
जो कुछ नहीं दिखा सब दृश्य में है
और नहीं दिख रहा है

विजय मोटरसाइकिल मिस्त्री की दुकान शनिवार को खुली हुई है
और उस खुले में दुकान की रविवार बंदी
नहीं दिखाई दी लेकिन सोमवार का खुला दिख रहा है

इसका उलट लेकिन एक छुट्टी के दिन हुआ
दुकान बंद थी
बंद के दृश्य में दुकान अदृश्य रूप से खुली हुई थी

और लोग पता नहीं क्यों
उस दिन मज़े लेकर मोटरसाइकिल बनवा रहे थे
मेरे पास सिर्फ एक खटारा स्कूटर है कोई मोटरसाइकिल नहीं है
लेकिन मैं भी सिगरेट पीता हुआ एक बजाज पल्सर बनवा रहा था

अदृश्य से घबड़ाकर मैं दृश्य में चला आया
और दोस्त से पूछने लगा इस दुकान के बारे में
तो वह बोला कि आज यह दुकान
ज़्यादा याद आ रही है क्या पता अपनी याद में खुली दुकान में
वह भी मेरी सिगरेट आधी पी रहा हो

मैंने घर आकर मन में कहा पांडिचेरी मैं वहाँ कभी नहीं गया हूँ
वहाँ का सारा स्थापत्य मैंने ख़ुद को बताया कि
पांडिचेरी शब्द की ध्वनि के पीछे है
लेकिन है ज़रूर
फिर मैंने एक वाक्य लिखना चाहा
लिखने पे चाह अदृश्य है शब्द दृश्य हैं
शब्द की वस्तुएँ दिखाई दे रही हैं और
जो मैं कहना चाहता था उसका कहीं पता नहीं है
वह शायद वाक्य के पर्दे में है
वह नहीं है वह है
मैं जो नहीं लिखना चाहता था वह क़तई नहीं है



















|| यही है ||

जैसे हर क्षण कुछ घट रहा है
हो रहा सब कुछ घटना है
ऐसा कुछ नहीं हो रहा है जो लग रहा था कि होगा
अनिश्चित इसे कहते हैं
पूरा नहीं होता हुआ ताल बज रहा है
उसका आवर्तन अनन्त जितना लम्बा जिसमें
पूरा भूगोल समय का
जंगली भालू है उसमें कुछ बाँसुरियाँ हैं
झीनी आवाज़ है नदी और माँ में से आती हुई
सब कुछ एक साथ यथार्थ है रहस्य है
यही है

[कविता के आलावा व्योमेश शुक्ल की अनुवाद तथा आलोचनात्मक व समीक्षात्मक लेखन में सक्रियता है | वाराणसी में जन्मे और पढ़े व्योमेश को कविता के लिए अंकुर मिश्र स्मृति पुरस्कार मिला है | यहाँ उनकी कविताओं के साथ दिए गए चित्र महेश प्रजापति की पेंटिंग्स के हैं | भिलाई में जन्मे, खैरागढ़ और शान्तिनिकेतन में पढ़े तथा चंडीगढ़ ऑर्ट कॉलिज में कार्यरत महेश ने देश-विदेश में अपनी पेंटिंग्स को प्रदर्शित किया है | उन्हें ललित कला अकादमी तथा इंटरनेश्नल प्रिंट एण्ड ड्राइंग त्रिनाले का अवार्ड मिला है |]



Thursday, August 18, 2011

सुभाष मुखोपाध्याय की दो कविताएँ














|| धूप में रखूँगा ||

हम उमरदराज़ लोग
क्यों बार-बार
घर लौट कर आँखें पोंछते हैं,
वह विस्मित लड़की सोचती है -
हम ज़रूर रो रहे हैं !
यदि नहीं
तो हमारी आँखें नम क्यों हैं ?
भोली लड़की !
हम कैसे समझाएँ
कभी-कभी आँखों के कुएँ के पानी में
रुलाई नहीं, जलन पैदा होती है,
भोली लड़की !
गीली लकड़ी को फूँकने से आग नहीं सुलगती
धुएँ के गुबार में जलती हैं आँखें,
जहाँ भी देखो सिर्फ धुआँ ही धुआँ !
जलती आँखें ले हम बाहर आते हैं
पोंछते हैं आँखें -
तभी तो हमारी आँखें नम रहती हैं

जीवन का यह हाल यूँ तो वर्ष-भर नहीं
केवल बारिश के कुछ माह ....
फिर
सूखी लकड़ियों की धधकती आग में
खदकेंगे चावल के दाने
तब तो जहाँ है - ठीक-ठाक
हम साफ़-साफ़ देख सकेंगे
वर्षा के बाद लकड़ी, कोयला, भीगा सब कुछ
हम धूप में रख देंगे

धूप में रख देंगे
यहाँ तक कि ह्रदय भी !!














|| मैं आ रहा हूँ ||

मैंने आसमान की ओर देखा
वहाँ तुम्हारा चेहरा था
मैंने बंद की आँखें
वहाँ तुम्हारा चेहरा था
वज्र को बहरा कर दे ऐसी आवाज़ में तुम मुझे पुकार रहे हो |

बच्चों की आवाज़ में
दिन और रात के टुकड़े - टुकड़े कर
कौन रो रहे हैं ?
मौत के आतंक में जीवन से लिपट कर
कौन रो रहे हैं |
और इसीलिए
वज्र को बहरा कर देने वाली आवाज़ में
तुम मुझे पुकार रहे हो |

मैं आ रहा हूँ -
दोनों हाथों से अँधेरे को ठेलते-ठेलते
आ रहा हूँ मैं |

किसने संगीनें तान रखी हैं ? ....हटाओ |
कौन खड़ी कर रहा है रुकावटों की दीवारें ? ... तोड़ो |
सारी धरती के लिए मैं लेकर आ रहा हूँ
न रोकी जा सकने वाली अनोखी शांति |

[सुभाष मुखोपाध्याय की मूल बंगला में लिखी इन कविताओं का अनुवाद उत्पल बैनर्जी ने किया है | कविताओं के साथ दिए गए चित्र रमेश झावर की पेंटिंग्स के हैं |]


Friday, August 12, 2011

लीलाधर मंडलोई की एक गद्य कविता

|| हत्यारे उतर चुके हैं क्षीरसागर में ||



















(एक)
मैं रोज़ सोता था सुकून की नींद | और अब जागता हूँ जैसे नींद में | भयावह सपनों में डूबी हैं रातें | मैं हत्यारों को देखता हूँ सपनों में | उनके चेहरे अमूर्त हैं | बस उनका होना परिचितों-सा लगता है | वे बनक-ठनक में सभ्य संभ्रांत दीखते हैं | उनके पास भव्य मोटरें हैं | वे अमूमन बड़ी-बड़ी कोठियों से निकलकर आते हैं | उनके पीछे चलने वालों की जमात है | जो नई-नई शक्ल में हर जगह उपस्थित हैं | वे हथियारों से लैस हैं | उनकी आत्मा का पानी सूख गया है | इस कारण वे पैसों के एवज़ हर उस चीज़ को खरीदने पर आमादा हैं जिसमें पानी है | और सरकारें अपनी तरह से इस व्यापार में हत्यारों की सरकारी गवाह बन चुकी हैं | मेरे इस सपने में जो बिना किसी स्टिंग ऑपरेशन के मूर्त है, मुझे आकंठ घेर लेता है डर में | मैं चीखना चाहता हूँ और आवाज़ जैसे गले में अटकी | सपना मुझे लिए भागता है चौतरफ | और मैं देखता हूँ वो सब जो कभी देखा नहीं | और इस तरह तो बिल्कुल नहीं | कि मेरी आत्मा लहूलुहान |



















(दो)
मैं तो बंधक उनका | हालाँकि यह तो स्वप्न में | मैं उनके पीछे भागता | कि जान सकूँ वह सच जो जीवन भर भारी बहोत | पानी कम होता हुआ गिरवी कहीं | उसके लिए मैं दौड़ता हूँ कि वह कितना बचा याकि बच जायेगा | संततियों की संभार के लिए | मैं उतरता हूँ एक माँ की कोख में | वहाँ एक भ्रूण है | अपने भार के तिरसठ प्रतिशत पानी में | उसी से जीवित वह | मैं कैसे जानूँ कि वह उसी मात्रा में है | और बच जायेगा सुरक्षित | अगर पानी कम हुआ | तो वह बचा हुआ होगा कितना कि जब जन्म लेगा | मैं उतरता हूँ अब अपनी देह में | वहाँ उसे होना चाहिए दो-तिहाई या तीन-चौथाई | और रक्त के प्लाज़मा में चार प्रतिशत होना जरूरी है | और कोशिकाओं में सोलह प्रतिशत | क्या इतना पानी सही-सही मात्रा में होगा | इधर अनेक बीमारियों से घिरा मैं, अब स्वप्न में हूँ डॉक्टर की टेबल पर | वह जाँच करता है और पर्ची में हिदायत लिखता है | मोटे अक्षरों में वह 'शुद्ध पानी' के सेवन पर ज़ोर डालता है यह जानते हुए कि वह सिर्फ प्रदूषित | बाज़ार के दावों को गले लगाए, मैं दौड़ता हूँ शुद्ध पानी के लिए | और झूठ पर एतबार करता हूँ कि जो सच की तरह परोसा गया | कि उसमें अकूत व्यापार | बस शुद्ध का विज्ञापन है अशुद्ध | पानी में वह होगा, ये भरोसा नहीं कर पाता और भय से काँपने लगता हूँ |

[लीलाधर मंडलोई सुपरिचित कवि व आलोचक हैं, जिनकी गद्य व पद्य की अनेकों पुस्तकें प्रकाशित हैं | यहाँ उनकी कविताओं के साथ दिए गए चित्र शैलेंद्र कुमार के मूर्तिशिल्पों के हैं | पूर्वी चंपारण में जन्में, खैरागढ़ विश्व विद्यालय में पढ़े शैलेंद्र ने अपने मूतिशिल्पों की तीन एकल प्रदर्शनियाँ की हैं तथा कई समूह प्रदर्शनियों में अपने मूर्तिशिल्पों को प्रदर्शित किया है |]

Tuesday, August 2, 2011

नरेन्द्र जैन की कविताएँ



















|| इस वक्त ||

इस वक्त
पीली सुनहरी रोशनी है
मकान में फड़फड़ाती अकेली

दीवारों पर चीज़ों की आधी
परछाई डोलती है
कमीज़ की दो बाहें
शीशी के आसपास दुबका अंधकार

तस्वीरों की खामोश आकृतियाँ
डूबी अपने निर्जीव संसार में
बाहर मटमैले आसमान में भटके यात्री सा
आधा चाँद
आखिरी नज़र डालता है
सामने फैले अंधकार पर

कैसी है यह दुनिया
जो रोज़ जिए चली जाती है

कैसा है यह मिट्टी का दिया
जो फैलाता है
इस विध्वंस के बीच
पीली सुनहरी रोशनी

आह, आखिरी तिनके का सहारा
कितना मज़बूत है
चट्टान की तरह



















|| यहाँ से आगे ||

यहाँ से आगे
कहाँ जाऊँगा
कुछ पता नहीं

लेकिन जानता हूँ
यहाँ से आगे रास्ता
ज़िंदगी की ओर जाता है

वह
अस्तबल में हो सकती है
हो सकती है खेत की मेड़ पर
मुँह में बच्चे के
मीठे स्तन की मानिन्द
हो सकती है

मृत्यु के ऐन सामने
किलकारी की तरह

सच तो यह है
मैं इस समय इसलिए लिखता हूँ
कि मुझे ज़िंदगी का सरनामा मालूम है
और जानता हूँ
कि
पा ही लूँगा उसे मैं



















|| कहाँ-कहाँ नहीं होता हूँ ||

हवा का हल्का झोंका
मुझे बहाये लिए जाता है

कहीं न होते हुए भी
कहाँ-कहाँ नहीं होता हूँ

दृश्य की सीध में
देखो मुझे

बिजली की कौंध में
हादसों के स्पर्श में
बच्चे की स्मृतियों में देखो मुझे

यह नहीं होगा कि
चट्टान की तरह रहूँ
एक सूखे पत्ते की दिनचर्या
ज़्यादा सहज जान पड़ती है
एक पल हवा के साथ
एक पल आग के साथ

हवा का एक झोंका
बहाये लिए जाता है मुझे



















|| आलू ||

जब कुछ भी नहीं
हुआ करता
आलू ज़रूर होते हैं

जब कुछ भी न होगा
आलू होंगे ज़रूर

स्वाद से ज़्यादा
भूख से ताल्लुक रखते हैं
आलू

टुकड़ा भर आलू हो
तो पानीदार सब्ज़ी बना ही लेती हैं स्त्रियाँ

मिट्टी में दबे आलू
मिट्टी से बाहर आकर
प्रसन्न ही होते हैं

जब
आँच में भूने जाते हैं
भूखा आदमी कह उठता है
शुक्र है खुदा का
यहाँ आलू हैं

[नरेन्द्र जैन की कविताएँ उनके कई संग्रहों में तो संकलित हैं हीं, रूसी भाषा में भी अनुदित होकर प्रकाशित हो चुकी हैं | उन्होंने ख़ुद भी कविताओं, कहानियों व नाट्य-कृतियों के हिंदी अनुवाद खूब किए हैं | दो-ढाई दशक पहले उन्होंने 'अंततः' नाम की पत्रिका का संपादन भी किया था | 1948 में जन्मे नरेन्द्र जैन का आज जन्मदिन है | आधुनिक चित्रकला के प्रति गहरा रुझान रखने वाले नरेन्द्र की यहाँ प्रस्तुत कविताओं के साथ दिए गए चित्र मुक्ता गुप्ता की पेंटिंग्स के हैं | विश्व भारती यूनिवर्सिटी से एमएफए मुक्ता ने रांची, जमशेदपुर, पटना, भुवनेश्वर, धनबाद, ग्वालियर, उज्जैन आदि में आयोजित हुए कला-शिविरों में भाग लिया है तथा इन जगहों के साथ-साथ दिल्ली, कोलकाता, लखनऊ आदि में आयोजित हुई समूह प्रदर्शनियों में अपने काम को प्रदर्शित किया है | दिल्ली की ललित कला अकादमी की दीर्घा में पिछले करीब एक सप्ताह से चल रही एक समूह प्रदर्शनी में उनकी पेंटिंग्स को देखा जा सकता है | मुक्ता ने अपनी पेंटिंग्स की एक एकल प्रदर्शनी भी की है, और वह कई संस्थाओं से पुरस्कृत व सम्मानित हुई हैं |]