Monday, July 26, 2010

नरेन्द्र जैन की 'बंगलूर डायरी'
















|| बल्लाशाह में सुबह ||

ईंट के भट्टों से निरंतर उठाता धुआँ
कुछ कत्थई, कुछ सुर्ख़ ईंटे
धुँध की गिरफ्त में स्तब्ध जंगल
विदिशा से सात सौ मील दूर
धान के खेत में खड़ी ये तीन सायकिलें
एक निरंतर जलता अलाव जो
नियामत है मजूरों के लिए

ऐ मौला
इस परिदृश्य का निर्माता तू हो ही नहीं सकता

आ और देख ये हाथ
जो कुछ गढ़ रहे निरंतर
जिनकी त्वचा इतनी कड़ी
कि
हुई जाती हथेलियों की रेखाएं छिन्न भिन्न


















|| सिरपुरकाग़ज़नगर से गुज़रते ||

धान के खेत में
औंधा पड़ा सूरज
लुगदी के विशालकाय दलदल से बाहर
आता
खामोश काग़ज़

अभी ख़ामोश है क्षितिज तक फंसा सूखता
काग़ज़

इसी काग़ज़ पर लिखे जायेंगे एक दिन
फ़ैसले, तकरीरें, जिरहें, बहसें, आजीवन कारा
किसी को मृत्युदंड

और चंद कविताएं




















|| सिकंदराबाद में पतंगें ||

जितने रंग हो सकते हैं सृष्टि में
और जिन रंगों कि खोज की जानी अभी
बाकी है
उन सारे रंगों को लिये

असंख्य पतंगों ने
कर दिया है आच्छादित सिकंदराबाद का
आसमान

रंगबिरंगी लहरों का एक ज्वार जैसे उफनता है
और तेजी से नीचे उतरता है

ये सूर्य के मकर राशि में प्रवेश की पूर्वसंध्या है
सिकंदराबाद के पतंगसाज़ व्यस्त हैं
और पतंगबाज़ देख रहे सिर्फ आसमान
की ओर

सबसे खुश है यह लड़का
जिसने काट दी है किसी की डोर
और हल्की सी उदासी उसके इर्दगिर्द है
जिसकी पतंग कटकर अब धरती की ओर
चली आ रही है



















|| जामे उस्मानिया का कब्रिस्तान ||

जामे उस्मानिया के कब्रिस्तान में
हर क़ब्र के सामने
एक घर का भी स्मारक है

यह घर इतना छोटा है
की इसे हथेली पर रखा जा सकता है
दिवंगत ने जिस लालसा से बनाया
होगा घर
उसके इंतकाल के बाद घर भी जैसे
दफ़न हुआ

जामे उस्मानिया का
यह शांत कब्रिस्तान
शायद इस तथ्य पर रौशनी डालता है
कि
आदमी घर बनाता है
लेकिन रहते हमेशा उसमें दूसरे हैं
















|| काज़ीपेट के मुर्ग़े ||

हालांकि सूरज सिर पर है
और धूप चौंधियां रही है
काज़ीपेट में दो मुर्ग़े इस घड़ी बांग दे
रहे हैं
हो सकता है
अभी नींद पूरी हुई हो
और दड़बे से बाहर आये हों वे मुर्ग़े

यह भी हो सकता है
कि उत्तर आधुनिक हों काज़ीपेट के
मुर्ग़े
और तयशुदा न रही हो
उनके बांग देने कि घड़ी

जो हो
काज़ीपेट
तो अलस्सुबह का जागा ठहरा
बस उस आलम में गूंज रही
बांग

[ समकालीन हिंदी कविता में अपनी खास पहचान रखने वाले नरेन्द्र जैन की इन कविताओं के साथ प्रकाशित चित्र के के हेब्बार के रूप में पहचाने जाने वाले प्रख्यात चित्रकार कतिंगगेरी कृष्ण हेब्बार की पेंटिंग्स के हैं | कर्नाटक के उडुपी जिले के कतिंगगेरी में 1911 जन्मे हेब्बार को 1961 में पद्मश्री तथा 1996 में पद्मभूषण सम्मान मिला था | ]

Monday, July 19, 2010

दीपशिखा की चार कविताएँ



















|| एक ||

फूलों से ज़्यादा काँटों पे चलने में मज़ा आता है
तप कर ही तो सोने में और निखार आता है

कोई साथ नहीं, कोई बात नहीं
अकेले भी रौब से जीया जाता है

फूलों से ज़्यादा ......

कोई जा के उनसे कह दे डरपोक नहीं हैं हम
चुप रहकर भी लड़ने का मज़ा लिया जाता है

फूलों से ज़्यादा .....

हार के भी जीतने का दम रखते हैं हम
गर इरादें हों फौलाद के, दुनिया को जीता जाता है

आज साथ नहीं है समय हमारे तो क्या
जो समय साथ मिला ले, उसे ही सिकंदर कहा जाता है

फूलों से ज़्यादा ......

सितारों से आगे इक जहाँ और भी है
देखने वाले को ही 'ख़ुदा' कहा जाता है

फूलों से ज़्यादा काँटों पे चलने में मज़ा आता है
तप कर ही तो सोने में और निखार आता है
तप कर ही तो सोने में और निखार आता है



















|| दो ||

रहमों कर्म की इनायत हमपे भी फरमाईए
अब इतने क़रीब आकर दूर यूं ना जाईए

रहमों कर्म की इनायत .......

दिल टूट-टूट जाता है जब तू निगाह चुराता है
ओ तोड़ने वाले ये दिल अब जोड़ते भी जाईए

रहमों कर्म की इनायत .......

माना के काबिल हम नहीं हैं आपके
बस चाहते हैं बहुत आपको, बाकी सब भूल जाईए

रहमों कर्म की इनायत .......

जी ना सकेंगे बिन तेरे, आजमा कर कभी भी देख ले
सालों हुए गम सहते हुए, अब खुशी भी देने आईए

रहमों कर्म की इनायत ........

सब पूछते हैं हाल क्या बना लिया है अपना
हमको भी हक़ है सजने का, वो हक़ तो अब लौटाइए

रहमों कर्म की इनायत .......

बैचेन बहुत रह लिया, तड़प लिया है बहुत
ओ चैन छीनने वाले, कुछ सुकूँ भी देते जाइए

रहमों कर्म की इनायत हमपे भी फरमाईए
अब इतने क़रीब आकर दूर यूं ना जाईए
अब इतने क़रीब आकर दूर यूं ना जाईए


















|| तीन ||

राह चलते कभी मिल जाते हैं वो
जी करता है वो मंज़र कभी खत्म न हो

पुराने सूखे वृक्ष भी हो जाते हैं हरे-भरे
गर्म तपती हवाएँ भी देती हैं ठंडक खड़े

महसूस यूं होता है मुस्कुरा रही है हर नज़र
दुश्मन भी लगते हैं गहरे दोस्त हमें इधर

रस्ते के पत्थर भी मलमल बन जाते हैं
धूल मिट्टी रेत के कण भी झिलमिलाते हैं

नल से बहता पानी भी अमृत सा लगता है
गुजरता हुआ हर शख्स अपना सा लगता है

क़दम उठाते हैं तो फूल बरसाता है आस्मां
मानो ये सारी कायनात है हम पर मेहरबाँ

अब क्या तारीफ़ करूँ मैं अपने हुज़ूर की
खुशियों से वो दिन भर जाता है

जब राह चलते कभी मिल जाते हैं वो
जी करता है वो मंज़र कभी खत्म न हो
जी करता है वो मंज़र कभी खत्म न हो



















|| चार ||

सफ़ेद लिबास, दमकता चेहरा
दीवाना बना देता है वो तेरा नूर सुनहरा

शरबत से मीठी तेरी बोली
मेरी सूनी शामों को भी बना देती है होली

सारे इत्रों से बेहतर वो महक है यार की
मेरे पूरे घर मैं फैली है, ऐसी चाहत है सरकार की

सुकून पहुँचाती है दिल को तेरे चलने की आहट
हजारों गम भुला देती है सिर्फ़ तेरी एक मुस्कुराहट

सागर से जो गहरा ये दिल है तेरा
मेरी हर अंधेरी रात का वो ही है सवेरा

सबसे ज़्यादा प्यारी है वो सादगी तेरी
सिर्फ़ तेरा ही नाम लेना अब है बन्दगी मेरी

सिर्फ़ तेरा ही नाम लेना अब है बन्दगी मेरी

क्योंकि क्योंकि वो सफ़ेद लिबास वो दमकता चेहरा
दीवाना बना देता है तेरा नूर सुनहरा

[ दीपशिखा मूलतः एक चित्रकार हैं और चंडीगढ़ में इंड्सइंड बैंक की कलादीर्घा में अपने चित्रों की एकल प्रदर्शनी कर चुकी हैं | उनकी पेंटिंग्स के लिये 'सेंटर फॉर ऑर्ट एंड कल्चर' ने उन्हें 'पिकासो सम्मान' से नवाज़ा है | पिछले कुछ समय से उन्होंने कविता में भी दिलचस्पी लेना शुरू किया है | हमारे बहुत आग्रह पर उन्होंने हाल ही में लिखी अपनी ये कविताएँ उपलब्ध करवाईं | दीपशिखा की कविताओं के साथ प्रकाशित चित्र प्रख्यात चित्रकार मंजीत बावा की पेंटिंग्स के हैं | ]

Friday, July 16, 2010

सुकुमारन की 'यह शताब्दी : तीन दृश्य' शीर्षक कविता



















|| दृश्य एक ||

मनुष्यों की तरह कटे हुए थे पेड़
उनके धड़ों से अभी भी हो रहा था रक्तस्राव

कल इसी रास्ते पर दिखा विरल सूर्योदय
पर्वत शिखर पर
सूर्य के मुख पर सृष्टि के आदिम मनुष्य की मुस्कान
पक्षियों की चहचहाहट
छायाओं की करुणा
पत्तों के समुद्रों की निरंतर लहरें
हवा के पार्श्व में फूलों के उदघोष
प्रकृति : मनुष्य का पहला कुतूहल
आज यह वन मरुस्थल-सा जलता है
कटे वृक्षों के बीच
धूप हुआँ-हुआँ कर रही है
वृक्षों के घाव में मौन निरपराध का
सरकारी कागज़ में चांडाल का दर्प
वृक्षों, मनुष्यों के बीच
चमक कुल्हाड़ी की

वीरान इस धरती पर
फड़फड़ाती है छटपटाहट अपने डैने



















|| दृश्य दो ||

एक रिपोर्ट :
हमारी यह शताब्दी
बेहोश पड़ी है ऑपरेशन की मेज़ पर
उसे तकलीफ है साँस की
जिगर में खराबी
हम इंतजार में खड़े हैं शवगृह के आसपास



















|| दृश्य तीन ||

मृत्यु के हाथों से गिरी और टूट गई रात उस शहर की
फैल गई शवों की दुर्गंध
सर्वत्र

गिरजाघरों से आते आख़िरी घंटे ने
ढाँप लिया दीन-हीन क्रंदन
पीढ़े से न हिलने वाला ईश्वर - मूँद ली अपनी खुली आँखें

वक्त से पहले लौटे नीड़ों में पक्षी मर गये
जड़ हो गये जानवर
खड़े-खड़े
मर गई नि:स्पंद होकर वनस्पतियाँ
एक क़दम और बढ़ गया विज्ञान
लाशें घसीटकर

हवा के पहियों पर सवार
मृत्यु ने खदेड़ा
पैरों में प्राण लिए
भाग रहे लोग, आया प्रलय जैसे

उस मरघट में हुई सुबह
विषैले मेघों से
सूर्य के केश हो गए सफ़ेद
शवों के ढेर में
आग की निरपराधिता

अख़बार की सुर्ख़ियों में
एक और घटना
सरकारी काग़ज़ में चांडाल का दर्प
मृत्यु का अदृश्य जाल सब जगह फैल रहा
खोने का आर्तनाद खो रहा दिशाओं में
लकड़ियों की तरह जमा कर दिए गए थे मनुष्य


[ सुकुमारन समकालीन तमिल कविता के एक सशक्त हस्ताक्षर हैं | उनके कई कविता-संग्रह प्रकाशित हैं | 1957 में जन्में सुकुमारन पत्रकार और अनुवादक भी हैं | उनकी यहाँ प्रस्तुत कविता का अनुवाद एन. बालसुब्रह्मण्यम ने किया है, जो तमिल, संस्कृत, अंग्रेज़ी, हिंदी में लेखन तथा अनुवाद करते हैं | सुकुमारन की कविताओं के साथ प्रकाशित चित्र वरिष्ठ चित्रकार शंकर घोष के बनाए मूर्तिशिल्पों के हैं | ]

Friday, July 9, 2010

कुमार पाशी की नज़्में



















|| मैं हँसना चाहता हूँ ||

मैं समँदर जितना हंसना चाहता हूँ
और बूँद जितना रोना

ईश्वर !
मैं सिर्फ़ तेरे ही जितना
जीना चाहता हूँ,
नित नए सपनों के साथ
अपनों के साथ

ईश्वर !
मैं पैग़म्बर नहीं हूँ
बिलकुल तेरी तरह हूँ
मेरी ख़्वाहिशों की फ़ेहरिस्त
बड़ी लंबी है
तेरी फ़ेहरिस्त से भी तवील -

लेकिन मैं
ईश्वर से क्यूं मुख़ातिब हूँ ?
जब कि मुझे मालूम है
वो मुझे फूल जितना हंसायेगा
और फिर
आस्मान जितना रुलायेगा



















|| अंतिम संस्कार ||

सूख चुकी है बहती नदी
आँखों में अब नीर नहीं है
सोचो तो कुछ
कहाँ गये वो भक्त, पुजारी
सुबह को उठ कर
जो सूरज को जल देते थे
कहाँ गया वो चाँद सलोना
जो लहरों के होंट चूम कर
झूम-झूम कर
आँखों की पुरशोर नदी में लहराता था

पानी से लबरेज़ घटाओ !
जल बरसाओ
सुन्दर लहरो !
आँखों की नदी को जगाओ
जाने कब से
बीते जुग के फूल लिये हाथों में खड़ा हूँ
सोच रहा हूँ, इन्हें बहा दूँ
जीवन का हर दर्द मिटा दूँ



















|| तेरी मख़्लूक़ तुझ से मुख़ातिब है ||

मेरे अन्दर नफ़ासत नहीं
गर्द ही गर्द है

तुम कभी मेरी खिड़की से झाँको तो देखो मुझे
मैं नहीं यह कोई दूसरा है
मिरा भूत है
मेरे अन्दर - यहाँ से वहाँ दनदनाता हुआ
अपने सूखे, सड़े गोश्त के चीथड़ों को उड़ाता हुआ
पहले वो कितना नज़दीक थी
हाथ अपना बढ़ाऊँ तो छू लूं - मगर
आज कितने धुँधलके हैं उस के मिरे दरमियाँ
ता हदे-जिस्मो-जाँ

आस्माँ - बोल !
वो जिस को देखा था सुबहों ने तेरी कभी
खिलखिलाते हुए
वो कहाँ खो गया ?
आज उस की लिखी सब किताबों में भी
उस की तस्वीर मिलती नहीं
लफ़्ज़ हैं : हड्डियों की तरह खोखले, बेसदा -
ऐ ख़ुदा -
तेरी मख़्लूक़ तुझ से मुख़ातिब है : सुन !

इन के हाथों में
इन के गुनाहों की फ़ेहरिस्त दे
और सदियों से पहले का लिक्खा हुआ फ़ैसला
आज इन को सुना

ऐ ख़ुदा -
तेरे मौसम भी मुझ को न बहला सके
मेरी नींदें न ख़्वाबों से महका सके
कोई अनदेखा मंज़र न दिखला सके

कोई है ?
जो अँधेरों के अम्बार में
मेरे खोये हुए नक़्श को
ढूँढ कर ला सके ?



















|| नई फ़स्ल के नाम ||

ये मासूम पौधे
ये धरती के बेटे
जिन्हें दूध का एक क़तरा भी शायद मयस्सर नहीं है
ये दिन रात बेजान आँखों से
अपने बदन की तरफ़ बेसबब घूरते हैं
बदन - जिन से लिपटा हुआ माँस कुम्हला चुका है
जहाँ अनगिनत टेढ़ी-मेढ़ी लकीरें
ख़ुनक चाँदनी की तमन्ना में उभरी हुई हैं

ये मासूम पौधे
ये धरती के बेटे, कि जिन की रगों में चुभन अपने होने की
दुःख के समँदर को कुछ और गहरा किये जा रही है
बहुत दूर - नीचे
तहों में पड़े मोतियों की चमक मन्द पड़ने लगी है
ये मासूम पौधे
अभी तक तसव्वुर की रंगीनियों के सहारे मुक़द्दर के अनदेखे
रूख़सार सहला रहे हैं
मगर इन को इतनी ख़बर भी नहीं है कि इन के सरों पर
खुला आस्माँ है
जहाँ धूप किरनों के धागे से इन के कफ़न सी रही है

[ आधुनिक उर्दू शाइरी में बड़ी पहचान रखने वाले कुमार पाशी 4 जुलाई 1935 को बग़दाद उल जदीद (पाकिस्तान) में पैदा हुए थे | विभाजन के बाद वह भारत आ गये और पहले जयपुर तथा फिर दिल्ली में रहे | 17 सितंबर 1992 को दिल्ली में उनका निधन हुआ | कुमार पाशी की यहाँ प्रस्तुत रचनाओं के साथ प्रकाशित चित्र अंजली सपरा की पेंटिंग्स के हैं | नई दिल्ली के त्रिवेणी कला संस्थान में प्रशिक्षित अंजली ने अपने चित्रों को दिल्ली, मुंबई, बंगलौर और लंदन में प्रदर्शित किया है | ]

Sunday, July 4, 2010

अनीता वर्मा की कविताएँ



















|| चेहरा ||

इस चेहरे पर जीवन भर की कमाई दिखती है
पहले दुःख की एक परत
फिर एक परत प्रसन्नता की
सहनशीलता की एक और परत
एक परत सुन्दरता
कितनी किताबें यहाँ इकट्ठा हैं
दुनिया को बेहतर बनाने का इरादा
और खुशी को बचा लेने की ज़िद |

एक हँसी है जो पछतावे जैसी है,
और मायूसी उम्मीद की तरह |
एक सरलता है जो सिर्फ़ झुकना जानती है,
एक घृणा जो कभी प्रेम का विरोध नहीं करती

आईने की तरह है स्त्री का चेहरा
जिसमें पुरूष अपना चेहरा देखता है,
बाल सँवारता है मुँह बिचकाता है
अपने ताकतवर होने की शर्म छिपाता है

इस चेहरे पर जड़ें उगी हुई हैं
पत्तियाँ और लतरें फैली हुई हैं
दो-चार फूल हैं अचानक आयी हुई खुशी के
यहाँ कभी-कभी सूरज जैसी एक लपट दिखती है
और फिर एक बड़ी सी खाली जगह |



















|| कहीं और ||

मनुष्य की पूरी कथा
जीवन से छल की कथा है
बहुत दूर प्रकट होते हैं इसके सरोवर
उनमें खिले दुर्लभ कमल
बहुत दूर रहते हैं इसके अदृश्य पहाड़
हरियाली और ढलानें
कहीं और बसता है सुबह का आलोक
बीरबहूटियों की लाल रेशमी कतार

कोई तारा पहुँच के ऊपर
शांत चमकता है
ठंडी रेत पर प्यार और धूप के बिना
ज़हर के पौधे पनपते हैं
बंदूकों के घोड़े बजते हैं कानों में
सूरज हलकान पक्षी की तरह
गिरता है नदी की गोद में
सो गई हैं समुद्र की मीठी मछलियाँ
पृथ्वी जैसे काले जादू बाज़ार की पिटारी |



















|| खोज ||

जितना जिया जाता है जीवन
उतने खतरों को पीछे छोड़ चुका होता है
उसके हाथ समय के भीतर प्रकट होते हैं
किसी झाड़ियों वाली पगडंडी पर

काँटों से बनी हुई है यह देह
जिसकी ताकत का अंदाज़ा लगाना अब भी कठिन है
वह छीन लेती है खुशी का कोई पल
जैसे यही हो सृष्टि की पहली खोज

सभी अकेले हैं
एक गोल घेरे में करते हुए क़वायद
जहाँ वे अपनी ढालें खोजते हैं
वे छिपते हैं शांति या संघर्ष के पीछे
एक पहाड़ पूछता है दूसरे पहाड़ का दुःख
एक विचार अपने ही बोझ से दबा हुआ रहता है
यहां कोई खिड़की नहीं है
फिर भी खुला रह जाता है कोई न कोई दरवाज़ा |



















|| शांत रात ||

मैं पहाड़ी हवा थी
बादलों के नीचे पत्तों की गोद में बहती हुई
नीली रोशनी पर सवार
पानी में अपने पैर टिकाये रहती थी |

गाती थी मूँगे और पंखों के गीत
सफ़ेद घोड़ों के अयाल सहलाती
किसी पुरानी गुफा की आँच में डूबी
हाथ की अँगूठी चुम्बनों की बनी हुई |

अब जबकि कोई नहीं है मेरे साथ
बंटी हुई है वह हवा दो खण्डों में पूर्वी और पश्चिमी
मधुमक्खियों ने बिखेर दिया है सारा शहद
समुद्र से उड़ती रहती है भाप और बादल नहीं बनता
समय के पैरों में चकाचौंध की बेड़ियाँ हैं
मैं देखती हूँ अपने उत्सव की नदी को
बहते हुए इस शांत रात में



















|| तभी ||

जब पहाड़ और झीलें तरंगित होने लगें समुद्रों में
पेड़ चिड़ियों के मित्र बन जाएँ
और उन्हें काटने की कुल्हाड़ियाँ बननी बंद हो जाएँ
दुनिया भर की बंदूकें किसी अतल में दफना दी गई हों
फौजी बूटों के मिट जाएँ कारखाने
बच्चों की हँसी से दमक उठें युवाओं के चेहरे
पृथ्वी बीजों का उत्साह गाने लगे
थकान और पसीने से भरी हो मिट्टी
कलुष और ईर्ष्या मरें अपने ही विष से
तभी मैं जागूँगी
धूप रोशनी और प्रेम के बीच
आऊँगी इस दुनिया में

[ अनीता वर्मा की यहाँ प्रस्तुत कविताओं के साथ प्रकाशित चित्र प्रखर युवा चित्रकार मुकेश साल्वी की पेंटिंग्स के हैं | अगस्त 1984 में जन्में मुकेश साल्वी ने जयपुर स्थित राजस्थान स्कूल ऑफ ऑर्ट से पहले बीएफए और फिर एमएफए किया है तथा अपने चित्रों को जयपुर, उदयपुर, कोटा, भोपाल, अहमदाबाद, बंगलौर, चेन्नई और मलयेशिया में प्रदर्शित किया है | छात्र जीवन में तथा उसके बाद उन्होंने कई पुरुस्कार व सम्मान प्राप्त किये हैं, और उन्हें कई एक कला-वर्कशाप में आमंत्रित किया गया है | ]

Sunday, June 6, 2010

गुलाम मोहम्मद शेख की दो कविताएँ











|| दिल्ली ||

टूटे टिक्कड़ जैसे किले पर
कच्ची मूली के स्वाद की सी धूप
तुगलकाबाद के खंडहरों में घास और पत्थरों का संवनन
परछाइयों में कमान, कमान में परछाइयाँ; खिड़की मस्जिद
आँखों को बेधकर सुई की मानिंद
आरपार निकलती
जामामस्जिद की सीढ़ियों की क़तार
पेड़ की जड़ों से अन्न नली तक उठ खड़ा होता क़ुतुब
चारों ओर महक
अनाज की, माँस की, खून की, जेल की, महल की
बीते हुए कल की, सदियों की
साँस इस क्षण की
आँख आज की उड़ती है इतिहास में
उतरती है दरार में ग़ालिब की मजार की
भटकती है ख़ानखानान की अधखाई हड्डी की खोज में
ओढ़ जहाँआरा की बदनसीबी को
निकल पड़ती है मक़बरा दर मक़बरा |
अभी भी धूल, अभी भी कोहरा
अब भी नहीं आया कोई फर्क माँस ओर पत्थर में
लाल किले की पश्चिमी कमान में सोई
फाख्ता की योनि की छत से होती हुई
घुपती है मेरी आँख में
किरण एक सूर्य की |
अभी तो भोर ही है
सत्य को संभोगते हैं स्वप्न
सबेरा कैसा होगा ?



















|| गर्मी की एक रात को ||

आज रात को
नीचे के डबरे में झरते हैं अमलताश के पीले फूल
लगता है फूल रातभर झरते रहेंगे
और सुबह तक तो
हो जाएगा अमलताश निर्वसन
चढ़ चुकी होगी डबरे पर एक पर्त फूलों की
मिट गई होगी पानी और जमीन के बीच की संधि रेखा
बगल के शिरीष की महीन कोंपलों पर ऊँगलियाँ फेरता
उठता है चाँद
शिरीष के पत्तों की नमी
और आसमान के थिराए प्रकाश के बीच नहीं बचा अब कोई फ़र्क
झूलती है अपनी ही परछाईं पर, छादन की बोगनबेल
झरोखे के खोखल में उड़ती है सोऊ पंडूक की नाक तक
आँगन की निबौरी की गंध
छत के भीतर की बल्ली से सरकता है नीचे को चमगादड़
धुल गया है इस वक्त
रास्ते को लगा दोपहर की धूप का जंग
फूटती हैं मेरे अधखुले कमरे के दरवाज़े से
गर्मी की धाराएँ
और सीढ़ियों तक पहुँचते पहुँचते फसक पड़ती है ढेलों की तरह
खड़ा रहता हूँ मैं दुविधा में
कि बरस पड़ता है मुझ पर, पूरा का पूरा अमलताश !

[ सुरेंद्रनगर, गुजरात में 1937 में जन्में गुलाम मोहम्मद शेख देश-दुनिया में मूलरूप से एक चित्रकार के रूप में जाने / पहचाने जाते हैं | चित्रकार के रूप में उनकी जो ख्याति है और उन्होंने जो काम किया है, उसके कारण ही उन्हें अन्य कई पुरुस्कारों व सम्मानों के साथ पद्मश्री भी मिली है | गुलाम मोहम्मद शेख देश-दुनिया में भले ही एक चित्रकार के रूप में जाने जाते हों, लेकिन गुजराती साहित्य में एक लेखक और एक कवि के रूप में भी उनकी खासी प्रतिष्ठा है | चित्र-रचना के साथ-साथ कविता-लेखन में समान अधिकार रखने वाले गुलाम मोहम्मद शेख की यहाँ प्रस्तुत मूल गुजराती में लिखीं कविताओं का हिंदी अनुवाद ज्योत्स्ना मिलन ने किया है | कविताओं के साथ प्रकाशित चित्र गुलाम मोहम्मद शेख की पेंटिंग्स के हैं | ]

Wednesday, June 2, 2010

वंशी माहेश्वरी की पाँच कविताएँ



















|| पुल की तरह खुला है दिन ||

सुबह से तनकर
बिछा है पूरा दिन
पिछली रात के अनंत स्पर्श लिए |

धरती से कुछ ऊपर
आकाश से कुछ नीचे
पुल की तरह खुला है दिन |

तमाम अनुभूतियाँ / स्मृतियाँ
जुड़ेंगी
इसके अंतिम छोर
रात की किरकिराती आँखों में
पूरा दिन फिर आयेगा
हमेशा
व्यतीत की तरह |

फिर उद्भव
फिर अंत
मनुष्यों की यादगार की अंतहीन
पुनर्जीवित गाथाएँ
पुल से गुजरेंगी

कुछ पुल के ऊपर
कुछ पुल के नीचे |















|| नींद नहीं सपने नहीं ||

रात
अनगिनत सपने बाँटती है हर रात
कई सपने
भटक कर लौट आते हैं
उन सपनों को
अपनी नींद में उतारती है रात !

सुबह तक वह
भूल जाती है
टूटती जुड़ती
अनगढ़ सपनों की दुनिया

सुबह से दिन भर के सारे एकांत समेट कर
व्यथित हुए
अपने निहंग संसार को
अँधेरे में बुनकर
बाँटती है
लौट लौट आते हैं
थक
कर सपने

पिछली कई रातों से
रात की आँखों में
नींद नहीं
सपने नहीं
उतार आये हैं मनुष्य !
जो भोर होते-होते
बे नींद
जीवन में लौट जाते हैं !















|| निर्वासित ||

असह्य उदास
निरीह बूढ़े आदमी की तरह
हाँफता
निर्वासित दुःख
जो मेरा नहीं
नहीं कह सकता कि मेरा नहीं !

इस क़दर अकेला
गुमसुम होकर
अपने निरपेक्ष चेहरे पर
उजाड़ होती शिकायतों के बाहर फैली खामोशी में
समय के आख़री क्षण को समेट कर रखता है
अँधेरे खण्डहर स्वप्नों के लिए !

उसका
निराश आक्रोश
अभिशप्त के शरीर से बाहर झाँक कर
कितने ही इंतज़ारों में
देखता है
शताब्दियों की मर्मान्तक यातना !

हर दम आता-जाता रहा उसका आना जाना
उसकी आहट में
अतीत है
आकाश है
मन के अँधेरे से फूटता उजाला है
और .....करुणा की असीम ऊष्मा है !



















|| व्यतीत ||

समय
घड़ी की तरह
शायद दीवार में

दिनारम्भ की फड़फड़ाती चेतना के साथ सूर्य
रोज़ाना
रोज़ाना ही उतरता जाता रहा है

कितने समय से
पता नहीं

कितने समय से
ये भी पता नहीं
कौन व्यतीत हो रहा है
समय या मनुष्य !












|| दिन का बीत जाना नहीं है ||

शायद बीतना दिन का स्वभाव है
बीत गए कई दिन |

कई दीवारें बनीं टूटीं
खण्डहर
बनते बिगड़ते चलते रहे
साँसों में उतरते .....

छोटी छोटी बातें
धड़कनों में बजती रहीं
स्मृतियों में
डूबती रही
शांति की लय

सहसा
चौंककर आसपास
वे दिन लौट आते हैं
आत्मा में धंस कर ....

[ पिपरिया से निकलने वाली पत्रिका 'तनाव' के संपादक वंशी माहेश्वरी हिंदी के परिचित कवि हैं | कविताओं के साथ दिए गए चित्र युवा चित्रकार सुनीता शर्मा की पेंटिंग्स के हैं | रीवा की सुनीता शर्मा स्वयं प्रशिक्षित चित्रकार हैं और रीवा, भोपाल, लखनऊ तथा दिल्ली में अपने चित्रों की एकल प्रदर्शनियाँ कर चुकी हैं | चंडीगढ़, उदयपुर और मुंबई में आयोजित हुई समूह प्रदर्शनियों में भी उनकी पेंटिंग्स प्रस्तुत हुई हैं | सुनीता शर्मा कविताएँ भी लिखती हैं | ]