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Wednesday, May 23, 2012

ज्ञानेंद्रपति द्धारा चयनित ख़ुद की दो प्रतिनिधी कविताएँ
















|| सूर्यास्त की आभा भी जब अस्त हो रही होती है ||

सूर्यास्त की आभा भी जब अस्त हो रही होती है
नदी का जल-पृष्ठ निरंग हो धीरे-धीरे सँवलाने लगता है जब
देखता हूँ, नदी के पारतट के ऊपर के आकाश में
एक झुंड है पक्षियों का
धुएँ की लकीर-सा वह
एक नीड़मुखी खगयूथ है
वह जो गति-आकृति उर्मिल बदलती प्रतिपल
हो रही ओझल
सूर्यास्त की विपरीत दिशा में नभोधूम का विरल प्रवाह
                                                       वह अविरल
क्षितिज का वही तो सांध्य रोमांच है
दिनान्त का अँकता सीमान्त वह जहाँ से
रात का सपना शुरू होता है
कौन हैं वे पक्षी
दूर इस अवार-तट से
पहचाने नहीं जाते
लेकिन जानता हूँ
शहर की रिहायशी कालोनियों में
बहुमंजिली इमारतों की बाल्कनियों में
ग्रिलों-खिड़कियों की सलाखों के सँकरे आकाश-द्धारों से
घुसकर घोंसला बनाने वाली गौरैयाएँ नहीं हैं वे
जो सही-साँझ लौट आती हैं बसेरे में
ये वे पक्षी हैं जो
नगर और निर्जन के सीमान्त-वृक्ष पर गझिन
बसते हैं
नगर और निर्जन के दूसरे सीमान्त तक जाते हैं
दिनारम्भ में बड़ी भोर
खींचते रात के उजलाते नभ-पट पर
प्रात की रेखा |
















|| आदमी को प्यास लगती है ||

कालोनी के मध्यवर्ती पार्क में  
जो एक हैंडपम्प है
भरी दोपहर वहाँ
दो जने पानी पी रहे हैं
अपनी बारी में एक जना चाँपे चलाये जा रहा है हैंडपम्प का हत्था
दूसरा झुक कर पानी पी रहा है ओक से
छक कर पानी पी, चेहरा धो रहा है वह बार-बार
मार्च-अख़ीर का दिन तपने लगा है, चेहरा सँवलने लगा है,
                                          कंठ रहने लगा है हरदम खुश्क
ऊपर, अपने फ्लैट की खुली खिड़की से देखता हूँ मैं
ये दोनों वे ही सेल्समेन हैं
थोड़ी देर पहले बजायी थी जिन्होंने मेरे घर की घंटी
और दरवाज़ा खोलते ही मैं झुँझलाया था
भरी दोपहर बाज़ार की गोहार पर के चैन को झिंझोड़े
                                    यह बेजा ख़लल मुझे बर्दाश्त नहीं
'दुनिया-भर में नंबर एक' - या ऐसा ही कुछ भी बोलने से उन्हें बरजते हुए
भेड़े थे मैंने किवाड़
और अपने भारी थैले उठाये
शर्मिन्दा, वे उतरते गए थे सीढ़ियाँ

ऊपर से देखता हूँ
हैंडपम्प पर वे पानी पी रहे हैं
उनके भारी थैले थोड़ी दूर पर रखे हैं एहतियात से, उन्हीं के ऊपर
तनिक कुम्हलायी उनकी अनिवार्य मुस्कान और मटियाया हुआ दुर्निवार उत्साह
गीले न हो जायें जूते-मोज़े इसलिए पैरों को वे भरसक छितराये हुए हैं
गीली न हो जाये कंठकस टाई इसलिए उसे नीचे से उठा कर
                           गले में लपेट-सा लिया है, अँगौछे की तरह
झुक कर ओक से पानी पीते हुए
कालोनी की इमारतें दिखायी नहीं देतीं
एक पल को क़स्बे के कुएँ की जगत का भरम होता है
देख पा रहा हूँ उन्हें
वे बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उत्पाद नहीं हैं
भारतीय मनुष्यों के उत्पाद हैं
वे भारतीय मनुष्य हैं - अपने ही भाई-बंद
भारतीय मनुष्य - जिनका श्रम सस्ता है
विश्व-बाज़ार की भूरी आँख
जिनकी जेब पर ही नहीं
जिगर पर भी गड़ी है |   

[ज्ञानेंद्रपति की कविताओं के साथ दिये गए चित्र देवीलाल पाटीदार के मूर्तिशिल्पों की तस्वीरें हैं |]