Sunday, April 8, 2012

भगवत रावत की दो कविताओं के साथ वाल्टर बोज की पेंटिंग्स



















|| जो रचता है वह मारा नहीं जा सकता ||

मारने से कोई मर नहीं सकता
मिटाने से कोई मिट नहीं सकता
गिराने से कोई गिर नहीं सकता

इतनी सी बात मानने के लिए
इतिहास तक भी जाने की ज़रूरत नहीं
अपने आसपास घूम फिरकर ही
देख लीजिए

क्या कभी आप किसी के मारने से मरे
किसी के मिटाने से मिटे
या गिराने से गिरे

इसका उल्टा भी करके देख लीजिए
क्या आपके मारने से कोई .....
.........ख़ैर छोड़िए

हाँ हत्या हो सकती है आपकी
और आप उनमें शामिल होना चाहें
तो आप भी हत्यारे हो सकते हैं
बेहद आसान है यह
सिर्फ मनुष्य विरोधी ही तो होना है
आपको

इन दिनों ख़ूब फल फूल भी रहा है यह
कारोबार
हार जगह खुली हुईं हैं उसकी एजेंसियाँ
बड़े-बड़े देशों में तो उसके
शो रूम तक खुले हुए हैं

तोपों के कारखानों के मालिकों से लेकर
तमंचा हाथ में लिए
या कमर में बम बाँधे हुए
गलियों में छिपकर घूमते चेहरों में
कोई अंतर कहाँ है
इस सबके बावजूद
जो जीता है सचमुच
वह अपनी शर्तों पर जीता है
किसी की दया के दान पर नहीं
वह अर्जित करता है जीवन
अपनी निचुड़ती
आत्मा की एक-एक बूँद से

उसकी हत्या की जा सकती है
उसे मारा नहीं जा सकता

इस सबके बावजूद वह रहता है
दूसरों को हटा-हटा कर
चुपचाप ऊँचे आसन पर जा बैठे
दोमुँहे, लालची, लोलुप आदमी की तरह नहीं

अपनी ज़मीन पर उगे
पौधे की तरह,
लहराता
निर्विकल्प
निर्भीक

दुनिया का सबसे कठिन काम है जीना
और उससे भी कठिन उसे, शब्द के
अर्थ की तरह रचकर दिखा पाना
जो रचता है वह मारा नहीं जा सकता
जो मारता है, उसे सबसे पहले
ख़ुद मरना पड़ता है |



















|| शिनाख्त ||

चेहरे से ही किसी को पहचान पाना
संभव हुआ होता तो तीस-चालीस बरस
पहले ही उसे ठीक से
पहचान लिया होता

बोलचाल और व्यवहार की
कुशलता से ही कुछ पता लगता तो
इतने बरस उसके मोह में
क्यों पड़ा रहता

चरित्र की अंदरूनी पेचीदगियों
और उसकी बाहरी बुनावट में
इतनी विरोधी दूरियाँ भी हो सकती हैं
यह बड़ी देर से समझ आया

दरअसल आज़ादी के ठीक बाद
लोकतंत्र के ढीले-ढाले झोल के चाल चलन में
धीरे-धीरे युवा होते हुए आदमी ने
वे सारे पैंतरे विरासत में
उन दलालों से सीख लिए थे जो हमेशा
ऊँट की करवट देखकर ही अपनी
चाल चलते थे

जिनके एक हाथ में राष्ट्रीयता का झंडा होता था
तो दूसरे हाथ में स्वामीभक्त होने का तमगा

कुल मिलाकर यह कि उसने
सीखी ऐसी सधी हुई भाषा जो किसी को
नाख़ुश नहीं करती
उसने गढ़े ऐसे नारे जिनसे न कोई
असहमत हो, न कर सके कोई विरोध

उसने अख्तियार की ऐसी
सधी हुई विद्रोही मुद्रा जिससे उसके शरीर पर
खरोंच तक न आये
और तेवर विद्रोही का विद्रोही रहा आये

उसने हर लड़ाई में हमेशा छोड़ी एक
ऐसी अदृश्य जगह जहाँ दुश्मन से
हाथ मिलाने की गुंजाइश
हमेशा रही आये

और इस तरह संघर्ष और विद्रोह की
ताक़तवर प्रतिरोधी दीवार के बीच लगाई उसने सेंध
और बन बैठा हमारा-आपका नायक
फिर इसके बाद क्या हुआ
यह बताने की शायद अब कोई ज़रूरत नहीं

आप ही की तरह मैं भी पड़ा रहा भ्रम में
कि गिरावट के इस घटाटोप में कहीं
कोई तो है जो लड़ रहा है
पर वह तो उसकी रणनीति थी
सबके कंधों पर पाँव रख कर उस जगह पहुँचने की
जहाँ संघर्ष और विद्रोह का
कोई अर्थ रह नहीं जाता

रह जाता है वह और केवल वह
और उसी के इर्द-गिर्द गूँजती उसी की
जय जयकार

यह सच है कि इतने समय तक
ख़ामोश रह कर हमने
खो दिये अपने सच बोलने के सारे अधिकार

फिर भी जाते-जाते इस जहान से
कुछ न कुछ तो करना होगा कारगर उपाय
जैसे यही कि यह कविता या इसका आशय ही
कहीं बचा रह जाये
और आने वाली किन्हीं युवा आँखों में
रोशनी की तरह
समा जाये |

[भगवत रावत की कविताओं के साथ दिये गए चित्र वाल्टर बोज की पेंटिंग्स के हैं |]

Monday, April 2, 2012

प्रोदोश दासगुप्ता के मूर्तिशिल्पों के साथ सुधीर मोता की चार कविताएँ



















|| नायक ||

भीड़ इकटठी होती है

उस मंच से उदित होता है
एक नया नायक

उनींदी आँखों से
देखते हैं वे थके लोग
कंधे पर टाँगे सफ़र की पोटली

सुनते हैं ललकार
जुड़ते हैं जयजयकार में

अचम्भे से देखते हैं
शहर
शहर एक चक्का जाम की शक्ल में
थम जाता है
देश में आने से पहले
सड़कों पर आ चुकी होती है क्रांति
क्रांति के अनुयायी
कुछ दुकानें लूटते हैं

एक बीमार अस्पताल नहीं पहुँच पाता
कुछ की रेल छूटती है
कुछ की नौकरी

इस तरह एक अज्ञात ठग
रातोंरात प्रसिद्ध हो जाता है
पन्नों पर
और परदों पर
छोटे छोटे सपने
उससे बड़े
और बड़े
बड़े से बड़े
इस तरह क्रम से
सपने देखने वालों का
पिरामिड खड़ा होता है

शिखर पर खड़ा वह
नया नायक
मूँछ उमेठता
मुदित होता है |



















|| उलट प्रवाह ||

बिल्कुल तुम दोनों पर गए हैं
तुम्हारे बच्चे

लोग कहते
और हम
सृजक होने के सुख से
सराबोर हो जाते

आँख नाक होंठ
ठोड़ी माथा
इस तरह गोया
सारे चेहरे का मिलान करते

फिर बड़े होते होते
चाल ढाल और आदतों से

आज चकित हूँ
पत्नी की बात पर
कहती है
तुम बिल्कुल बच्चों की तरह
होते जा रहे हो

छोटे वाले की तरह
जल्दी नाराज हो जाते हो
बड़े की तरह
लापरवाह हो गए हो

सिनेमा में
पड़ोस की सीट वाले से
पूछते हो
कितनी देर हो गई शुरू हुए

टीवी पर सास बहू के सीरियल
और समाचार छोड़
अटपटे गाने
या मसखरों की हरकतें देखते हो

मैं ताज्जुब करता हूँ
गुणसूत्रों के रसायन का
यह उलट प्रवाह है
पिता का बच्चों पर जाना

या जीवन की
उत्तर गाथा का शुरू होना है
बचपन का लौट आना |



















|| कौन हैं वे ||

अब तक तो यही पता है
यहीं पर है जीवन
इस पृथ्वी नामक उपग्रह पर

इसी से बना यह तथ्य
कि मृत्यु भी यहीं है
इस पृथ्वी पर

भूकम्प तूफान बवंडर बिजली भूस्खलन के आँकड़े
चन्द्र बुध मंगल शनि या
अन्य किसी ग्रह के संदर्भ में भी होंगे
वैज्ञानिकों के पास
मृत्यु के नहीं
क्योंकि मृत्यु के आँकड़ों के लिए
पहले जीवन का होना बहुत जरूरी है

पहले जरूरी है
जन्म की ख़ुशी के गीत
खेती किसानी उड़ावनी के गीत
प्रेम और उल्लास के गीत
मोह के और
एक दूसरे के प्रति राग का गीत
जैसे जरूरी हैं
बिछोह की कसक के लिए

हममें से जितने लोग
जानते हैं जीवन के बारे में
दुखी होते हैं
सौ हजार लाख या केवल एक मृत्यु में
उन लोगों के अतिरिक्त
जो जानते हैं केवल
मृत्यु के बारे में

जिनके पास मृत्यु के अट्टहास हैं
भय की फसल के बीज हैं
घृणा की शोकान्तिकाएँ हैं

पृथ्वी के बारे में जानते हैं
भूखंडों की कीमत जानते हैं
मृत्यु के थोक बाजार की
नब्ज
अच्छी तरह पहचानते हैं

कैसे मृत्यु विशेषज्ञ
बन गए ये लोग
जीवन के बारे में जाने बगैर

कौन हैं वे लोग
कहाँ के
क्या सचमुच इसी उपग्रह के ?



















|| अभी-अभी ||

उस बक्से में देखा अभी
एक हत्या होते हुए
देखा धूँ धूँ जलता हुआ
एक मकान
जिसके भीतर
प्रेम लाड़ दुलार सत्संग
और मन और देह के
न जाने कितने
रूपक रचे गए होंगे

खाक होते हुए खिलौने
किताबें तस्वीरें ख़त
जिनकी कोई प्रतिकृति
किसी के पास नहीं होगी
जिन्हें कोई बीमा कम्पनी
या सरकार
मुआवजे से नहीं भर सकेगी

इसके बाद नहीं सिहरेगा कोई
ऐसा दृश्य देख कर
जैसे अब नहीं काँपता जी
रेल दुर्घटना दंगे विस्फोट
में लोथड़ा हुई लाशों
की तस्वीरें देख कर

अभी देखा
नारी को पहली बार
इतनी कुटिल
सन्तानों को इतना कृतघ्न
संबंधों को देखा
औद्योगिक उत्पाद की तरह
लादे उतारे जाते

ऐसे दृश्य जब
हाथ पकड़कर बिठा लेते हैं
शून्य मस्तिष्क लिए
आप घंटों बैठे रहते हैं

रुक जाते हैं न जाने कितने
सलोने शब्द
प्रेम कविता बनने से
गज़ल रूठ जाती है
सत्यकथाओं के भार से
कथाएँ दब जाती हैं

अभी-अभी
एक रचना की
भ्रूण हत्या हुई

आपको पता भी
न लगा |

[सुधीर मोता की कविताओं के साथ दिए गए चित्र प्रोदोश दासगुप्ता के मूर्तिशिल्पों के हैं | यह वर्ष प्रोदोश दास गुप्ता का जन्मशताब्दी वर्ष भी है | 1994 में वह यह संसार छोड़ कर न चले गये होते तो इस वर्ष अपना सौंवा जन्मदिन मनाते | उनके काम को देखना अपने समय और अपने संसार की अनुगूँजों को महसूस करना है | 'कलकत्ता ग्रुप' के संस्थापक सदस्य के रूप में प्रोदोश जी ने भारतीय मूर्तिशिल्प को वास्तव में समकालीन पहचान दी है | उनके मूर्तिशिल्प नई दिल्ली में ललित कला अकादमी की दीर्घा में प्रदर्शित हैं, जिन्हें 13 अप्रैल तक देखा जा सकता है |]

Friday, March 23, 2012

आशा गुलाटी की चित्र-रचनाओं के साथ आशमा कौल की चार कविताएँ















|| मौसम ||

मौसम इतना बेवफा
निकला
अंदर आँसू थे
बाहर बादल पिघला

काली घटाओं ने
घेर लिया है मुझको
आज फिर मैंने
पुकारा है तुमको
मौसम .....

शक्ल तेरी जब
हर घटा में बनने
लगती है उसी दम
घटा बिखरने लगती है
न जाने कब,
बेवफाई कर
छोड़ देगा मौसम
हर घटा को
तुम्हारी शक्ल कर देगा
यह किस दम |















|| आगमन करो ||

सूरज की किरणें
और ऊष्मा
जैसे बंद खिड़की के
शीशे से होकर
मुझ तक
आ रही हैं
क्या वैसे ही
मेरे विचारों की
ऊष्मा और गहराई
तुम्हारे मन के
कोनों तक
पहुँच पाएगी

मेरा रोम-रोम
जिस तरह
सजीव हो उठा है
किरणों के आगमन से
क्या तुम्हारा मन भी
स्पंदित होता है
मेरे इन
भावुक शब्दों से

और जैसे ये किरणें
मेरे अंतर्मन को
सहलाती हैं
क्या मेरे विचारों का
दिवाकर
तुम्हारे कोमल ह्रदय को
बहला पायेगा ?

यदि हाँ, तो आज अभी
मन की खिड़की खोलो
इन शाब्दिक
किरणों की ऊर्जा से
ओत-प्रोत होकर
आगमन करो
नव प्रभात !
नव लालिमा का |















|| दुनिया गोल है ||

दुनिया तिकोन नहीं
चौकोर नहीं
गोल है
इज्ज़त से लेकर
कफ़न तक
सब कुछ मिलता
सबका यहाँ मोल है

गरीब से धनी तक
अफसर से बाबू
मंत्री से संतरी तक
का चरित्र
यहाँ डांवाडोल है
दुनिया .....

गरीबी है, बीमारी है
लूट और चोरबाजारी है
आँखों में सबकी
लाचारी है
मिलते हर जगह
सिर्फ बड़े-बड़े बोल हैं
दुनिया ......

झूठ का एक परचम
सच बेमानी है
मर गया शहर में जो
वह आँख का पानी है
खोल रहे जो सब
एक दूसरे की पोल हैं
दुनिया तिकोन ......















|| जीने की चाह ||

मैंने उसे मरते देखा
हर दिन
जीने की चाह में
हर आहट पर
उसका चौंकना
हर किसी को
अपने पास रोकना
उसकी विवशता दिखाता

हर लम्हे को
वह कैद करना चाहता था
बंद मुट्ठी में
हर शब्द को
सजाना चाहता था
दिल की गहराई में

मैं देखती थी
उसका सबसे बतियाना
फिर अचानक
गुम होना तन्हाई में
पर मैं लाचार थी
उसके चंद लम्हात ही
सजा सकती थी

कोसती थी खुदा को
मूकदर्शक बन वह
सब देख रहा था
अगले दिन का आना
उसके बचे पलों का
कम हो जाना

इसी उधेड़-बुन में
समय उड़ गया जैसे
उस दिन सूर्य उगा
ऊष्मा लिए आकाश में
दूसरा सूरज डूब गया
ठंडा होकर अस्पताल में |


[आशमा कौल की कविताओं के साथ दिए गए चित्र आशा गुलाटी के काम के हैं | आशा गुलाटी ने पेपर कोलाज में अप्रतिम काम किया है, जिन्हें वह कई एकल प्रदर्शनियों में प्रदर्शित कर चुकी हैं | रचनात्मक अन्वेषण के साथ, प्रकृति के रहस्य और विस्मय को उन्होंने चमत्कारिक ढंग से रचा है | आशा गुलाटी ने अपनी रचना-यात्रा हालाँकि जलरंगों व तेल रंगों से शुरू की थी, लेकिन कुछ अलग रचने/करने की उनकी उत्सुकता उन्हें पेपर की विविधताओं के पास ले आई | शुरू में उन्हें यह मुश्किल भरा ज़रूर लगा, किंतु चूँकि उन्होंने हार नहीं मानी और मुश्किलों को चुनौती की तरह लिया - सो फिर उनके लिए कुछ भी मुश्किल नहीं रहा | आज पेपर कोलाज और आशा गुलाटी एक दूसरे के पर्याय के रूप में पहचाने जाते हैं | आशमा कौल के तीन कविता संग्रह प्रकाशित हैं और वह कई संस्थाओं द्धारा सम्मानित व पुरस्कृत हो चुकीं हैं |]

Wednesday, March 14, 2012

मालविका कपूर की पेंटिंग्स के साथ अशोक वाजपेयी की चार कविताएँ



















|| उम्मीद चुनती है 'शायद' ||

उम्मीद चुनती है अपने लिए एक छोटा-सा शब्द
शायद -

जब लगता है कि आधी रात को
दरवाज़े पर दस्तक देगा वर्दीधारी
किसी न किए गए जुर्म के लिए लेने तलाशी
तब अँधेरे में पालतू बिल्ली की तरह
कोने में दुबकी रहती है उम्मीद
यह सोचते हुए कि बाहर सिर्फ हवा हो
शायद |

फूलों से दबे संदिग्ध देवता के सामने हो रही
कनफोड़ आरती, कीर्तन
और घी-तेल की चीकट गंध में
किसी भुला दिए गए मंत्र की तरह
सुगबुगाती है उम्मीद
कि शायद अधपके नैवेध्य और चिपचिपाती भक्ति के नीचे
बची रह गई हो थोड़ी-सी प्राचीन पवित्रता |

जब लगता है कि भीड़-भाड़ भरी सड़क पर
सामने से बेतहाशा तेज़ आ रहा बेरहम ट्रक
कुचलकर चला जाएगा
उस न-जाने-कहाँ से आ गई बच्ची को
तभी उम्मीद
किसी खूसट बुढ़िया की तरह
न-जाने-कहाँ से झपटकर
उसे उठा ले जाएगी
नियति और दुर्घटना की सजी-धजी दूकानों के सामान को
तितर-बितर करते हुए |

शायद एक शब्द है
जो बचपन में बकौली के नीचे खेलते हुए
अकस्मात झरा था फूल की तरह
शायद एक पत्थर जो खींचकर किसी ने मारा था
परीक्षा में अच्छे नंबर न पाने की उदासी पर
शायद एक खिड़की है जिससे देखा था
धूमिल होती जाती प्रियछवि को
शायद एक अनजली अस्थि है
जिसे मित्रशव को फूँकने के बाद
हम वहीं भूल गए
जहाँ चिता थी
और जिसे आज तक किसी नदी में सिरा नहीं पाए हैं |

उम्मीद ने चुना है
एक छोटा-सा पथहारा शब्द
'शायद |'



















|| वैसी पृथ्वी न हो पाने का दुःख ||

खिड़की के पास चुपचाप खड़ी होकर
देखती है पृथ्वी
कि कैसे बनाती है दूबी
अपनी छोटी-सी मेज़ पर
एक छोटी-सी कापी में
एक और छोटी-सी पृथ्वी |

एटलस से काटकर
कुछ भू-भाग
कुछ हरी दूब और सूखी वनस्पतियाँ
कुछ टुकड़े, पन्नियाँ चमकीली जमाकर
मेरी बेटी
गढ़ती है अपनी एक पृथ्वी
जो धड़कती है
बिना किसी मनुष्य के |

अपने गोलार्धों में
बँटी-फँसी पृथ्वी
कुछ पछतावे से सोचती है
क्यों नहीं बनाया
किसी ने उसे
वैसी ही पृथ्वी ?















|| अगर इतने से ||

अगर इतने से काम चल जाता
तो मैं जाकर बुला लाता देवदूतों को
कम्बल और रोटियाँ बाँटने के लिए |

बैठ जाता पार्क की बेंच पर,
एक अकेले उदास बूढ़े की तरह
होने के कगार पर,
और देखता रहता पतझर
चुपचाप ढाँकते पृथ्वी को |

चला जाता
उस बे-दरो-दीवार के घर में,
जिसे किसी बच्ची ने
खेल-खेल में
अपनी कापी में खींच रखा है |

ले जाता
अपनी गुदड़ी से निकालकर
एक पुरानी साबुत घड़ी का उपहार,
अस्पताल में पड़े बीमार दोस्त के लिए
ताकि वह काल से बचा रह सके |

आत्मा के अँधेरे को
अपने शब्दों की लौ ऊँची कर,
अगर हरा सकता
तो मैं अपने को
रात-भर
एक लालटेन की तरह जला रखता |

अगर इतने से काम चल जाता !














|| कितना बजा है ? ||

कितना बजा है ?
पूछता है सत्रहवीं शताब्दी के अँधेरे में
बुर्ज पर खड़ा एक चौकीदार
अपनी लालटेन की कम होती रोशनी में |
किसी यहूदी कवि की रचनाओं का
अनुवाद करने की कोशिश में बेहाल
भारी फ्रेम के चश्मेवाली लड़की पूछती है
मानो किसी प्राचीन ग्रंथ के
सर्वज्ञ नायक से -
कितना बजा है ?

थककर चूर हुआ दुर्दांत बूढ़ा देवता
जम्हाई लेता हुआ
चीखता है शून्य में -
कितना बजा है ?

कुँजड़िनों के झगड़ों से त्रस्त
और अपनी स्कूली पुस्तकें कहीं न पाने से दुखी
छतों की दुकान के सामने
पैसे न होने के बावजूद ललचाता हुआ एक बच्चा
जानना चाहता है एक मुस्तंड खरीदार से -
कितना बजा है ?

अपने जीवन की धुँध से घिरा
बचपन के मुबहम होते जाते चेहरों को
खोने के पहले याद करता हुआ
रक्त के मौन में कहीं
दूर से आ रही पुकार सुनता हुआ
मैं इसी अधबनी कविता से पूछता हूँ -
कितना बजा है ?

[लखनऊ स्थित ललित कला अकादमी के रीजनल सेंटर में कार्यरत मालविका कपूर ने बनारस हिंदु विश्वविद्यालय से पहले बीएफए और फिर एमएफए किया है | कई समूह प्रदर्शनियों में अपनी पेंटिंग्स प्रदर्शित कर चुकीं मालविका उत्तर प्रदेश ललित कला अकादमी से पुरस्कृत हैं तथा अभी हाल ही में मुंबई की जहाँगीर ऑर्ट गैलरी में उनकी पेंटिंग्स की एकल प्रदर्शनी आयोजित हुई है | उनकी पेंटिंग्स में दिखती रंगाभिव्यक्ति में जीवनानुभवों की उस सूक्ष्मता को महसूस किया जा सकता है जो वैचारिक सरलीकरण के बीच गुम से हो गए हैं | उनकी पेंटिंग्स के साथ प्रस्तुत कविताओं के रचयिता अशोक वाजपेयी समकालीन हिंदी कविता के क्षेत्र में अपना एक अलग स्थान रखते हैं |]

Thursday, September 8, 2011

ब्रज श्रीवास्तव की दो कविताएँ

















|| अँधियारा ||

अजीब दहशत सी है जब
अपने शहर के आने पर झाँकता हूँ बाहर ट्रेन से
वहाँ घुप्प अँधेरा है

भय का उदगम है ये अँधकार
न जाने क्या चीज़ किस चीज़ से
टकरा जाए बुरी तरह

यह वह अँधियारा है
जिसे सूरज छोड़ गया अपने आने तक
जो घर की छत से चिपका है
नदी किनारे रेत के कणों के बीच में
और गहरा गया है

ये दुनिया के बनने के पहले दिन से है
अस्तित्व में
इसका होना देर तक, अखरता है हमें
हम डरे हुए हैं दरअसल
अपनी बनाई चीज़ के मौजूद न होने पर

अँधियारा इसीलिए हुआ है भयानक आज
क्योंकि हमने कल तक इसे
अलग करके नहीं देखा
रोशनी से



















|| इस तलाश में ||

आँखों में सँजो लेना चाहता हूँ
खेत में बिछी काली मिट्टी की उर्वरता का तेज़

मोटर बस में सफ़र करते हुए
यह भी सोचता हूँ
सूरज की दमक
देती रहे एक पुंज ऐसे ही

दोस्तों की बातों में ही
खोज लेता हूँ
जीवन के हक़ में बोले जाने वाली बात

किसी पक्षी की तरह
इकट्ठा कर रहा हूँ
प्यार की बातों के तिनके

इस तलाश में
जिन चीज़ों को रद्द करता हूँ
वे अचरज से घूरती हैं मेरी ओर
और हँस पड़ती हैं
मेरे फ़ैसले पर

[ब्रज श्रीवास्तव की कविताओं के साथ दिए गए चित्र समकालीन कला परिदृश्य में अपनी खास पहचान बना रहे चित्रकार शाम पह्पलकर की पेंटिंग्स के हैं |]

Friday, September 2, 2011

वरवर राव की दो कविताएँ



















|| दुःखी कोयल ||

इस साल ख़ूब बरसा पानी
भर गए नदी नाले
पिछले दस सालों में
कोई भी ऋतु समय पर कहाँ आई थी ?
जेल में क़दम रखते ही
कोयल का स्वागत-गान सुनकर चकित हुआ
सोचा
क्या अभी से बसंत की ऋतु आ गई ?

निज़ाम-युग की दीवारें
कँटीले तार बिजली की मार
सेंट्री की मीनार
दीवारों के अंदर दीवारें
द्वार के अंदर द्वार
ताला लगाना ताला खोलना
पहरे के गश्तों के बीच कैद पड़ी हरियाली
न उड़ सकने वाले कबूतर
अहाते के अंदर बंदी-जैसा आसमान
नीरव दोपहर में 'अल्लाह-ओ-अक़बर' की गूँज
भीगी धरती को छूकर काँपने वाली हवा
सारी ऋतुएँ यहीं बंदी बनी हुई थीं अब तक
आम की कोंपलों और नीम के फूलों का
एक जैसा स्वाद
बेल्लि ललिता की तरह
जकड़ती ज़ंजीरों का गीत
गाता रहता है जेल का कोयल हमेशा
मैं आ गया हूँ शायद इसलिए
या दोस्त कनकाचारी नहीं रहा इसलिए |



















|| मैं हूँ एक अथक राहगीर ||

मैं एक अथक राहगीर हूँ
घुमक्कड़ हूँ
अँधेरी रातों में दामन फैला कर
आसमान से तारे माँगता रहता हूँ
चाँदनी रातों में
जंगल के पेड़ों से फूल माँगता रहता हूँ

आसमान और ज़मीन ने मुझसे कहा -
तारे टूटकर गिरते हैं तो मनुष्य बनते हैं
मनुष्य बड़े होकर लड़कर अमर होकर
आकाश के तारे बनते हैं
फूल धरती पर गिरकर बीज बनते हैं
बीज ही पेड़ बनकर हवा को पँखा झलते हैं
अपने लिए राह के लिए या दीन दुखियों के लिए
किसके लिए दौड़ रहे हो तुम
यह मालूम हो जाए
तो तुम माँग रहे हो या भीख चाहते हो
यह भी स्पष्ट हो जाएगा

मैं लंबी साँस खींच कर
छाती में प्राणवायु भरकर
निर्जीव उसाँस छोड़ता हूँ
फिर भी हवा चलती रहती है
बाँसों के झुरमुट में बाँसुरी बनकर

मैं अँजुरी में पानी भरकर पीता हूँ
लूट को छिपाकर रखता हूँ
सूखा और बाढ़ की सृष्टि करता हूँ
फिर भी
नदिया सुर बनकर
दरिया गीत बनकर
झरना साज बनकर
प्रवाह संगीत बनकर
बहता ही रहता है
धूप खिलकर
प्रकृति का सत्य प्रकट करती रहती है

समय में क्षण की तरह
अणु में परमाणु की तरह
सागर में बूँद की तरह
आग के गोले में चिंगारी की तरह
आगे पीछे
क़दम से क़दम मिलाते हुए
लड़खड़ाते हुए
बिना रुके चलोगे ...छलाँग लगाओगे ...
तभी इस राह में तुम एक चल बनोगे ...
यह कहकर हँसे धरती और ग़गन !

[प्रख्यात क्रांतिकारी तेलुगु कवि वरवर राव की मूल तेलुगु में लिखी इन कविताओं का अनुवाद आर. शांता सुंदरी ने किया है | कविताओं के साथ दिए गए चित्र मशहूर चित्रकार गोपी गजवानी की पेंटिंग्स के हैं |]


Friday, August 26, 2011

व्योमेश शुक्ल की चार कविताएँ















|| जानना ||

एक दिन कीड़ा काग़ज़ पर बैठा
लेकिन इस बैठने से कुछ समझ पाना असंभव था
इस तरह हल्का असंभव एक बार छोड़ कर चला गया वह मेरे लिए
मैं पतंग उड़ाना तैरना या हारमोनियम बजाना नहीं जानता हूँ
वैसे ही इस कुछ या बहुत कुछ को समझना या सोचना भी शायद नहीं जानता
हूँगा मैंने ख़ुद से कहा
एक जोड़ा आँसू के डब डब को तब समझ नहीं पाया था
ख़ुशी में रोने को समझता हूँ थोड़ा बहुत
अक्सर ख़ुशी को ही नहीं समझ पाता हूँ
रोना जानता हूँ
प्यार करना और पढ़ना दुनिया के सबसे कोमल और पवित्र काम हैं
निर्दोष हँसना अब शायद कोई नहीं जानता
तमाम काम यह एक बड़ा सच है कि तमाम लोग नहीं जानते
जानना हमेशा एक मुश्किल काम रहा



















|| कुछ देर ||

तुम्हारी दाहिनी भौं से ज़रा ऊपर
जैसे किसी चोट का लाल निशान था
तुम सो रही थी और वो निशान ख़ुद से जुड़े सभी सवालों के साथ
मेरी नींद में
मेरे जागरण की नींद में
चला आया है
इसे तकलीफ़ या ऐसा या ऐसा ही कुछ कह पाने से पहले
रोज़ की तरह
सुबह हो जाती है

सुबह हुई तो वह निशान वहाँ नहीं था
वह वहाँ था जहाँ उसे होना था
लोगों ने बताया : तुम्हारे दाहिने हाथ में काले रंग की जो चूड़ी है
उसी का दाग़ रहा होगा
या कहीं ठोकर लग गई हो हल्की
या मच्छर ने काट लिया हो
और ऐसे दागों का क्या है, हैं, हैं, नहीं हैं, नहीं हैं
और ये सब होता रहता है

यों, वो ज़रा सा लाल रंग
कहीं किसी और रंग में घुल गया है

हालाँकि तब से कहीं पहुँचने में मुझे कुछ देर हो जा रही है



















|| मैं जो लिखना चाहता था ||

आँख से अदृश्य का रिश्ता है
मुझे लगा है सारे दृश्य
अदृश्य पर पर्दा डालते हुए होते हैं
जो कुछ नहीं दिखा सब दृश्य में है
और नहीं दिख रहा है

विजय मोटरसाइकिल मिस्त्री की दुकान शनिवार को खुली हुई है
और उस खुले में दुकान की रविवार बंदी
नहीं दिखाई दी लेकिन सोमवार का खुला दिख रहा है

इसका उलट लेकिन एक छुट्टी के दिन हुआ
दुकान बंद थी
बंद के दृश्य में दुकान अदृश्य रूप से खुली हुई थी

और लोग पता नहीं क्यों
उस दिन मज़े लेकर मोटरसाइकिल बनवा रहे थे
मेरे पास सिर्फ एक खटारा स्कूटर है कोई मोटरसाइकिल नहीं है
लेकिन मैं भी सिगरेट पीता हुआ एक बजाज पल्सर बनवा रहा था

अदृश्य से घबड़ाकर मैं दृश्य में चला आया
और दोस्त से पूछने लगा इस दुकान के बारे में
तो वह बोला कि आज यह दुकान
ज़्यादा याद आ रही है क्या पता अपनी याद में खुली दुकान में
वह भी मेरी सिगरेट आधी पी रहा हो

मैंने घर आकर मन में कहा पांडिचेरी मैं वहाँ कभी नहीं गया हूँ
वहाँ का सारा स्थापत्य मैंने ख़ुद को बताया कि
पांडिचेरी शब्द की ध्वनि के पीछे है
लेकिन है ज़रूर
फिर मैंने एक वाक्य लिखना चाहा
लिखने पे चाह अदृश्य है शब्द दृश्य हैं
शब्द की वस्तुएँ दिखाई दे रही हैं और
जो मैं कहना चाहता था उसका कहीं पता नहीं है
वह शायद वाक्य के पर्दे में है
वह नहीं है वह है
मैं जो नहीं लिखना चाहता था वह क़तई नहीं है



















|| यही है ||

जैसे हर क्षण कुछ घट रहा है
हो रहा सब कुछ घटना है
ऐसा कुछ नहीं हो रहा है जो लग रहा था कि होगा
अनिश्चित इसे कहते हैं
पूरा नहीं होता हुआ ताल बज रहा है
उसका आवर्तन अनन्त जितना लम्बा जिसमें
पूरा भूगोल समय का
जंगली भालू है उसमें कुछ बाँसुरियाँ हैं
झीनी आवाज़ है नदी और माँ में से आती हुई
सब कुछ एक साथ यथार्थ है रहस्य है
यही है

[कविता के आलावा व्योमेश शुक्ल की अनुवाद तथा आलोचनात्मक व समीक्षात्मक लेखन में सक्रियता है | वाराणसी में जन्मे और पढ़े व्योमेश को कविता के लिए अंकुर मिश्र स्मृति पुरस्कार मिला है | यहाँ उनकी कविताओं के साथ दिए गए चित्र महेश प्रजापति की पेंटिंग्स के हैं | भिलाई में जन्मे, खैरागढ़ और शान्तिनिकेतन में पढ़े तथा चंडीगढ़ ऑर्ट कॉलिज में कार्यरत महेश ने देश-विदेश में अपनी पेंटिंग्स को प्रदर्शित किया है | उन्हें ललित कला अकादमी तथा इंटरनेश्नल प्रिंट एण्ड ड्राइंग त्रिनाले का अवार्ड मिला है |]