Friday, September 10, 2010

तरसेम गुजराल की पंजाबी कविताएँ



















|| निस्सारता की कला ||

पुरानी हो गई बूढ़ी सदी
पुरानी हो गई ग़रीब पर दया
पुराना पड़ गया
इंसाफ़ के हक़ में
कुदाल उठाता मज़दूर |

विज्ञापन में लड़की का बदन ताज़ा है
सिगरेट के हवा में उड़ते छल्ले ताज़ा हैं
गोरेपन की क्रीम फिर भी ताज़ा है
खनिज के साथ बिक रहा
तुम्हारा ख़ून भी ताज़ा है |

मिट्टी मिट्टी होती ज़मीन ने कुछ कहा नहीं
सूखते हुए तालाब ने
उठते शॉपिंग मॉल्स पर कुछ कहा नहीं |
इतिहास की गली में जो जाने को तैयार नहीं
कहता है करमावाली का भट्ठा आख़िरी है
पवित्र पापी* का घड़ीसाज़ आख़िरी है
कोने का वह मोची भी आख़िरी है
पिता का श्राद्ध भी आख़िरी है |
[ पवित्र पापी : नानक सिंह का उपन्यास ]



















|| कश्मीर से विस्थापित ||

बची हुई जगह में
उसके फैल नहीं पाते इरादे
भटकन में आकाश का
फ़ैसला नहीं कर पाती
कि कितना उसका |

बची हुई जगह में
भीतर उतरती है
तो बीते का दर्द
पसलियों से उठता है
मरोड़ कर रख देता है पूरी देह |

सेब जैसे गाल सेब जैसे नहीं रहे
परन्तु दाँत बहुत-से लोग लगाए बैठे हैं |



















|| बयान ||

जब बारिश ने कोहराम मचा दिया
मैंने पवनदूत से आकाश विचरण करते हुए आँसू बहाए
क़र्ज़ में डूबे किसान ने आत्महत्या की
मैंने पाठ रखवाया
उसकी आत्मा की शांति के लिए |

उस इज्ज़त लुटी कबूतरी की
मैंने पाले हुए बिल्ले से शादी करवा दी
पुलिसे ने तोड़ डाली मज़दूरों की हड्डियाँ
मैंने प्रत्येक टूटी टांग के बीस हज़ार
प्रत्येक टूटी बाँह के पचास हज़ार दिलवाए |

क्या नहीं किया मैंने
विचारों को विचारों तक ही
रखने वाले क़लमनवीसों को
पुरस्कृत किया
ख़ाली कुर्सी की आत्मा के लिए
पूजाघर बनवाए |

आज तुम कहते हो
बारिश में जिनके मकान गिरे
अभी तक नहीं बने |
किसान को बचाया जाना ज़रूरी
कबूतरी को मैंने ही मरवाया |
मज़दूर हमारे कानों के बंद होने से पिटे |
विचारों में बहुत थी पेचदार गलियाँ
और ख़ाली कुर्सियों की पूजा
मंदी सफ़ेद हाथियों को पालने से जुड़ी है
अब तुम ही बताओ
तुम्हें गुरबद वाली इमारत दूँ या तुम्हारा अचार डालूँ ?















|| नींद के बाहर ||

बहुत सो लिया
तुम्हें भी जागना होगा
मुझे भी |

जागना होगा
कि एक चीख़ सुनते ही
खुल जाएँ सभी खिड़कियाँ
ताकि शब्दों में ढल जाए, वह ज़हर
जो पीते रहे लोग चुपचाप |

जागना ही होगा
कि चमत्कार हथेली पे नहीं उगते
आलू की सब्ज़ी से लेकर
स्वप्न को आकार देने तक
मेहनत आदमी का धर्म है |

जागना ही होगा
कि सोते हुए
व्यवस्था, क़ानून और संविधान
तुम्हारी क़मीज़ चुरा लेने वाले को
कोई सज़ा नहीं देते |

जागना ही होगा
कि इस वक्त
चंद किरणों ने
अँधेरे को बालों से पकड़ रखा है |

[ तरसेम गुजराल पंजाबी के सक्रिय लेखक हैं | कहानी, उपन्यास व कविता की उनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हैं | भाषा विभाग से वह पुरस्कृत हैं | यहाँ जो कविताएँ दी गईं हैं, उनका अनुवाद ख़ुद तरसेम गुजराल ने ही किया है | कविताओं के साथ प्रकाशित चित्र ललित शर्मा की पेंटिंग्स के हैं | उदयपुर के ललित शर्मा अपने परिवार में पांचवीं चित्रकार पीढ़ी का नेतृत्व करते हैं | पारंपरिक कला का प्रशिक्षण उन्हें अपने परिवार में ही मिला | उदयपुर यूनीवर्सिटी से कला की उच्च शिक्षा प्राप्त करते हुए ललित शर्मा का परिचय समकालीन कला से हुआ और तब उन्होंने पारंपरिक व समकालीन कला के मेल से अपनी कला को विकसित किया | उदयपुर, उज्जैन, जयपुर, अहमदाबाद, पुणे, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, नई दिल्ली में वह अपने चित्रों को कहीं एकल प्रदर्शनियों में तो कहीं समूह प्रदर्शनियों में प्रदर्शित कर चुके हैं और विभिन्न शहरों में सम्मानित व पुरस्कृत हो चुके हैं | ]

Saturday, September 4, 2010

अंकुर बेटगेरी की कविताएँ















|| शहर में अजनबी ||

पैदा हुआ बैंगलोर में
पर यह शहर मेरा नहीं
क्योंकि वे बेचते हैं इसे
और मुझे करते हैं ख़रीदने को विवश
हरदम एक बताए गए तयशुदा रास्ते पर
चलने को मजबूर मैं
अजनबी शहर में एक अजनबी

रेस्तराँ में टूरिस्ट
मॉल में टूरिस्ट
सिनेमा हॉल में टूरिस्ट
पार्क में भी टूरिस्ट ही हूँ मैं

पैसा फेंको, तमाशा देखो
और चलता करो !
टिकट की शक्ल में ख़रीदा गया
जो समय और जितना
मेरा है बस उतना
पर यह समय नहीं रच सकता कोई स्मृति
क्योंकि इसकी कोई ज़मीन नहीं
जिसमें मैं धँसा सकूँ अपनी जड़ें

मैं किसी भ्रूण की तरह सोता हूँ सिकुड़कर
अपने इर्द-गिर्द की चीज़ों की अनुपस्थिति में
उनकी गर्माहट से ऊर्जा पाता
मेरे जीने का हिस्सा नहीं बन सकती जो
मैं अकेला और मुक्त
किसी चाबी से चलायमान गतिविधियों के
निर्वात में झूलता

जब मैं लिखता हूँ
जो कुछ है, उसका चमत्कार छूता है मुझे
और इस तरह मैं धीरे-धीरे
जीवंत हो उठता हूँ
और यह दुनिया भी मेरे भीतर
जीवंत हो उठती है !















|| मै पानी हूँ ||

मै प्यार करना और प्यार किया जाना पसंद करता हूँ
मैं और ज़्यादा प्यार करना और
ज़्यादा प्यार किया जाना पसंद करता हूँ
मैं हर जगह होना पसंद करता हूँ
और हर काम करना चाहता हूँ
मैं एक चिंपाज़ी हूँ जो सोचता है, सोचता है और सोचता है
और इस तरह व्यवहार करता है मानों उसने पूरे ब्रह्मांड को
अपने माथे में भर लिया है
मैं पानी हूँ और उन सब लोगों के शरीर में घुस जाता हूँ
जिन्हें पसंद करता हूँ और उनकी साँसों में
थरथराता हुआ ठहर जाता हूँ
मैं पानी हूँ, जब मै ख़ुश होता हूँ, फूट पड़ता हूँ
और हर जगह बहने लगता हूँ
मैं पानी हूँ और जहाँ खुशियों और दर्द के आंसू हैं, मैं वहाँ हूँ
मैं पानी हूँ, मेरा कोई किनारा नहीं है
और मैं किसी भी चीज़ में पूरी तरह भरा नहीं जा सकता
(जिसमें भी भरा जाता हूँ, बाहर छलकने लगता हूँ)
मैं पानी हूँ, जहाँ संसार के सारे शिशु अपना
पहला स्वप्न देखते हैं, मैं वहाँ हूँ
मैं पानी हूँ, मैं अपने जमे हुए हृदय से
बिजली और गड़गड़ाहट पैदा करता हूँ
मैं पानी हूँ और जब मैं भावुक होता हूँ
मै लहर पैदा नहीं करूँ, संभव नहीं
जब मैं बहुत ही भावुक होता हूँ
मैं ज्वार भी पैदा कर सकता हूँ
मैं पानी हूँ, मैं बवंडरों से पानी की प्रतिमाएँ बनाता हूँ
जो शहर से ऊँची उठती हैं, पर ठहरती नहीं
मैं पानी हूँ, मैं गर्म दोपहरों की बारिश की शांति हूँ
जो होशो-हवास में गिरती है, जब भी बेहोशी में खोई-खोई
मैं पानी हूँ, कितनी सारी चीज़ें मुझे पारिभाषित करती हैं
लेकिन तब भी कोई एक भी चीज़ मुझे पारिभाषित नहीं करती
मैं पानी हूँ, अँजुरी भर मुझे लो
मुझमें लोगों के समुद्र जैसा स्वाद है !



















|| प्यार ||

तेरे भीतर से तोड़ लेता है तुझे
और मेरे भीतर से मुझे
और छोड़ देता है इन्हें
अनंत में
जैसे बसंती बयार में
फूलों की पंखुड़ियाँ हों-
प्यार बस यही तो करता है !

फ़िज़ा में बस एक महक रह जाती है..

शिराओं में जान आ जाती है
जब तेरे भीतर की तू मिलती है
मेरे भीतर के मैं से

तैरती हुई
मद्धम धुनों की तरह
समय की सिंफनी में !



















|| कविताई ||

कविता की पहली शर्त यही
कि ख़ुद को कभी गंभीरता से मत लो
पर तब भी अपने भीतर की आवाज़ के प्रति
बने रहो वफ़ादार

तुम्हारा दर्द कुछ और नहीं
तुम्हारी सच्चाई का गाढ़ापन है
जिनसे तुम्हारे अंतस की छवियाँ
पाती हैं शब्द रूप

इसके अलावा हर चीज़ अतिरिक्त
चाहे वह प्यार की पेचीदगियाँ हों
या निजी संत्रास
जो पैदा हुईं ख़ुशियों की तलाश में

कविता रोज़मर्रे की सलवटों को सुलझाती हैं
और आपके अंदर की गुनगुनाहट को
तब तक करती है तीव्र
जब तक कि यह आपके सत्व को
व्यवस्थित नहीं कर देती
और एक गुंजायमान संगीत रह जाता है शेष !

[ कन्नड और अंग्रेज़ी के युवा कवि अंकुर बेटगेरि का अंग्रेज़ी में 'द सी ऑफ़ साइलेंस' तथा दो कविता-संग्रह कन्नड में प्रकाशित हैं | यहाँ दी गईं कविताएँ मूल रूप से अंग्रेज़ी में लिखी गई हैं, जिनका अनुवाद राहुल राजेश ने किया है | कविताओं के साथ प्रकाशित चित्र दीपा सेठ की पेंटिंग्स के हैं | शिमला में कला की विधिवत शिक्षा प्राप्त करने वाली दीपा सेठ की पेंटिंग्स कई जगह प्रदर्शित हो चुकी हैं | ]

Monday, August 30, 2010

सुरेश ऋतुपर्ण की कविताएँ



















|| एक और सूर्यास्त ||

फिर हुआ सूर्यास्त
ज्योति के पत्र पर किन्तु
नहीं लिखा गया
उस अपराजेय समर का विवरण
जो मैंने लड़ा
पूरे दिन

दौड़ते-हाँफते
झल्ली में उठाया वज़न
खाई डाँट
माँजते बर्तन

ढोता रहा
तीन पहिए पर
रावण का थुलथुल बदन

यों मुझे भी आती रही
याद प्रिया की हर क्षण
दूर देश में कहीं
पैबंद लगी धोती में सिमट
तोड़ती होगी पत्थर
भरे नयन

कैसी है विवशता जीवन की
लड़ना है युद्ध
नित नूतन
नहीं पास कोई
हनु-लखन

ज्यों-ज्यों बढ़ता है
समय-चक्र आगे-आगे
देह-धनुष की प्रत्यंचा
ढीली पड़ती जाती है

होगा कैसे शक्ति का आराधन
सत्ता की देवी अब चाहे
राजीव नयन नहीं
केवल स्वर्ण मंजुषाओं का अर्पण

कैसे होगी जय !
फैला है जब हर ओर
भ्रष्ट नैशान्धकार
दूर कहीं जलती नहीं मशाल

कैसे होगी जय !
नियति पृष्ठ पर लिखी जब
मात्र एक पराजय
होगी कैसे जय !

लो फिर हुआ
एक और सूर्यास्त



















|| एक दिन ||

बँधी मुट्ठी से
रेत की तरह
झर जाएँगे हम एक दिन

रूपहले कणों में झिलमिलाते
बहुत याद आएँगे
हम एक दिन

उड़ेंगे ऊपर आसमान में
पतंग की तरह
रंगों के पूरे उठान के साथ
उम्र की सादी डोर पर
वक्त का तेज माँझा
चलाएगा अपना पेच
हिचकोले खाते
फिर जाएँगे हम एक दिन

हवाओं की लहरों पर
थिरकती कंदील की है क्या बिसात!
बरसा कर
जगमगाते रंगों की लड़ियाँ
बुझ जाएँगे हम एक दिन

घाटी में खिलखिलाते
दौड़ लगाएँगे बच्चों की तरह
और बिखेर कर खुशबू
फूलों की तरह
झर जाएँगे हम एक दिन

धरती की छाती फोड़
उगेंगे फिर एक दिन
पकेंगे धूप की आग पर
हँसिये की तेज धार से
झूमते-झूमते कटेंगे हम एक दिन

सूखेंगे, पिसेंगे, गुंधेगे
चूड़ियों भरे हाथों से
सिकेंगे उपलों के ताप पर
और पेट की बुझाएँगे
आग हम एक दिन

बरसेंगे उधर हिमालय की चोटियों पर
बर्फ़ बन जम जाएँगे
सूरज की किरणें भेदेंगी मर्म भीतर तक
आँख से बहते आँसू की तरह
पिघल जाएँगे हम एक दिन

आकाश की ऊँचाई नापते
परिन्दे के टूटे पंख की तरह
अपनी नश्वरता में तिरते
अमर हो जाएँगे हम एक दिन |

बँधी मुट्ठी से
रेत की तरह
झर जाएँगे हम एक दिन |



















|| दिनों का इंद्रजाल ||

दिन-दिन गिनते
बीते कितने दिन !
डायरी के पन्नों में
दर्ज नहीं
उनकी आवाजाही का ब्यौरा

पर इन दिनों में
उन दिनों की याद है जो
तह किये कपड़ों सी
रखी है मेरे सिरहाने
जो सपनों में
इन्द्रधनुष-सी तन जाती है
घुल जाती है
दूध में बताशे की तरह |

दिनों की एक लम्बी
सड़क है मेरे पास
जिस पर चलतीं रहती हैं
अनगिनत वारदातें और शरारतें
कि जिनकी याद
भर देती है हरारत
शिराओं में
और तलवों में
कसकती है सफ़र की थकान |

रोज़मर्रा के कामों की फेहरिस्त में
दाल-चावल-मसालों की तरह
अटके हैं दिन
कभी आँखों में
आंसू बन डबडबाते हैं
तो कभी
मार खा सोई बच्ची
के सुर्ख़ ओंठों पर
तैरती सुबकन की तरह
उभर आते हैं दिन |

दिन, रात-दिन
खेलते हैं
चोर-सिपाही का खेल
आज तक पर जान नहीं पाया
कौन है सिपाही
और चोर है कौन?
जानता हूँ तो बस इतना
दोनों ने ही
चुपके-चुपके चुराया है
मेरा वर्तमान |

तमाम उलझनों के बीच
कबूतरों की तरह फड़फड़ाते
उड़ते फिरते हैं दिन
हवाओं के समंदर में
लगाते हैं डुबकियाँ
फिर वहीँ लौट आते हैं
उसी वीरान-सी छत की मुंडेर पर
जहां लाल होती शाम
बाहों में आते-आते
अटल उदासी के सागर में डूब गई थी |

पतंग की तरह
उड़ते रहते हैं दिन
हाथों से जुड़े होकर भी
दूर-दूर रहते हैं दिन
अपनी जादुई उंगुलियों से
हर क्षण
रचते हैं मुझे
रच-रचकर बिगाड़ते हैं दिन
लिख-लिखकर मिटाते हैं दिन

कभी सींचते हैं
तो कभी सोख़ते हैं
कभी भर देते हैं लबालब
और फिर
पूरा का पूरा
खाली कर जाते हैं दिन !

दिनों के इस इंद्रजाल में
कैद है मेरे दिनों का तिलिस्म !



















|| बीज ||

मैं बीज होना चाहता हूँ |

गहरे, बहुत गहरे
गर्भ में उतर
अंकुरित होना चाहता हूँ

बीज बनना चाहता हूँ |

शब्द हुए नि:शब्द मेरे
ध्वनियाँ हो गयीं हाहाकार
स्वर डूब गये सन्नाटे में
रेखाएँ हुईं निराकार

किसी असाध्य-वीणा का
खिंचा तार होना चाहता हूँ

बीज बनना चाहता हूँ |

होंठ हो गये पथरीले
सूखे ठूंठ सी बाँहें
वर्जनाओं की आंच सुलगती
पथ-भ्रष्ट हुई निगाहें

ज्वालामुखी के मुहाने पर
लावे सा धधकना चाहता हूँ

बीज बनना चाहता हूँ |

शान्त हैं लहरें, मगर
कल्पना के पाल थरथराते हैं
चुपचाप तिरती नाव को
भावना के भँवर बुलाते हैं

बहुत निभा ली मर्यादा सागर की,
अब ज्वार बन उमड़ना चाहता हूँ |

बीज बनना चाहता हूँ |

कामना की नर्म कोंपलों से
भरी हैं शाखें
खुशबू का जाल फेंकतीं
फूल सी खिली हैं मेरी आँखें

धूप चांदनी में नहा लिए बहुत
खाद बन, मिट्टी में समाना चाहता हूँ |

बीज बनना चाहता हूँ |

[ जापान की 'तोक्यो यूनीवर्सिटी ऑफ फॉरेन स्टडीज़' में प्रोफ़ेसर पद पर कार्यरत सुरेश ऋतुपर्ण की कविता और आलोचना की कई किताबें प्रकाशित हैं | मथुरा में जन्मे सुरेश देश-विदेश की विभिन्न संस्थाओं से सम्मानित हैं | यहाँ प्रकाशित उनकी कविताओं के साथ लगे चित्र भोपाल की प्रतिभाशाली चित्रकार भावना चौधरी की पेंटिंग्स के हैं | देश के विभिन्न शहरों में भावना के चित्रों की प्रदर्शनी हुई है; मध्य प्रदेश कला परिषद सहित कई संस्थाओं ने एक चित्रकार के रूप में उनकी प्रतिभा को रेखांकित करते हुए उन्हें सम्मानित किया है | ]

Tuesday, August 24, 2010

रमन मिश्र की कविताएँ



















|| बारिश के मौसम में ||

(एक)
बरसात की रिमझिम-रिमझिम बूँदों में
जब शामों की उदासी भीगने लगी है
मेरा अकेलापन मुझे ही काट खाने को दौड़ रहा है
मेरे सीने में धड़क रही है
किसी शोक धुन की अनुगूँज

मैं शर्मिन्दा हूँ
एक बहुत निजी कविता के लिए
मैं शर्मिन्दा हूँ
अपने दु:ख़ को लिखते हुए

मेरा वजूद
संस्कारों की कँटीली झाँड़ियों में फँसा
परिन्दों की तरह छटपटाता है

एक पराजित आबोहवा में साँस लेते हुए
बार-बार अपनी पराजय को ठोकर मारता हूँ
बार-बार अँगुलियों को लहूलुहान करता हूँ

यादों की गीली सड़क पर टहलते-टहलते
पर उदास कविता को जन्म देते हुए
मेरे भीतर का कवि चिन्तित है

माँ- कहीं किसी कोने से
दिलासा देती है
उम्मीद जगाती है

इरादों में ज़ंग लगे हिस्से को
फिर-फिर साफ़ करता हूँ |



















(दो)
हवाएँ उन माँओं की तरह
छाती पीट-पीट कर चिल्ला रही हैं
क्रूर हादसे - जिनके जवान बेटों को
असमय छीन लिया करते हैं
पेड़ पौधों पर पागलपन सवार है
मौसम के चीख पुकार की तरह फैल रहा है
धरती और आकाश के बीच
काला धुंआ |

अतीत
किसी जंगल की भाँति
मेरे भीतर हहरा रहा है |
एक काली छाया
आँखों के आइने में
डरावने बादलों की गरजती आवाज़ से
अचानक सारा शरीर काँप जाता है

इच्छाओं की चिड़ियाँ
अपने-अपने घोसलों में दुबक जाती हैं
महत्वाकांक्षी मन ज़ोर से चिंघाड़ता है



















(तीन)
तेज़ बौछारों ने खिड़कियाँ दरवाज़े भिगो दिये हैं
गीले कपड़ों की अजीब सी गन्ध
नथुनों में समा गयी है

हर चीज़ को डसते हुए
हर चीज़ को फुफकारते हुए
एकान्त रेंग रहा है
दिवाल घड़ी की टिक-टिक के सहारे
इस रात की मनहूसियत गूँज रही है
हम ठंड से सिकुड़ी-सिमटी ज़िन्दगी को
इन्तज़ार की आँच में सेंक रहे हैं |

समय का घोड़ा दौड़ रहा है
घाटियाँ टप टप की आवाज़ों से गूँज रही हैं

जब कल पौ फटने पर
अँधेरी चट्टानों में दरार पड़ेगी
सुबह के चेहरे पर
ज़िन्दगी की लालिमा बिखर जायेगी

मैं लिखूंगा - उजली उजली
धूप जैसी कविताएँ



















|| तुम्हारी अँगुलियों के स्पर्श का जादू ||

वे तमाम कलाकृतियाँ
जिसमें रची बसी हैं
तुम्हारे पसीनों की सोंधी महक

तराशा है जिनको तुम्हारी
मेहनत के एक एक लफ़्ज़ ने

हमारे दिलों की धड़कनों में
गूँजता है आज भी
उन्हीं कलाकृतियों का संगीत

तुम्हारी अँगुलियों के स्पर्श का
जादू निरन्तर तब्दील हुआ है
ज़िन्दगी की धुन में

महान सपनों को साक्षात
धरती पर खड़ा कर देने की मुहिम
तुम्हीं ने छेड़ी थी एक दिन

पहाड़ों को काट कर
नदियों को ढकेल कर
तुम्हारे हाथों ने सँवारा है

कुदरत को खूबसूरती के
बेहतरीन अन्दाज़ में

तमाम नवजात चीज़ों को
तुमने सींचा है
अपने लहु से,
तब कहीं जा कर
दुनिया जवान हुई है

[ अक्तूबर 1962 में जन्मे रमन मिश्र मुंबई की सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रीय रहे हैं | पत्रिकाओं में तो उनकी कविताएँ प्रकाशित होती ही रही हैं, उनके कविता संग्रह भी प्रकाशित हुए हैं | उनकी यहाँ प्रकाशित कविताओं के साथ के चित्र महान फ्रांसीसी शिल्पकार रोदां (1840 - 1917) के मूर्तिशिल्पों के हैं | ]

Friday, August 20, 2010

आलोक वर्मा की कविताएँ



















|| कवि-कथा ||

कुछ शब्द बने खून और पसीने से
कुछ शब्द बन गए खून और पसीना
कुछ शब्द भटकते रहे आवारा
मंडराते रहे आसपास
बहुत दिनों तक
फिर मायूस हो छोड़ गए साथ एक दिन
कुछ शब्द शामिल हुए सपनो में
और हरी दूब, संतरा
या सूर्य या कोयला
या पुरानी सायकिल बन गए
कुछ शब्द खफ़ा हुए
काहिली के चलते
कुछ शब्द चुरा लिए गए बाज़ार में
और बदल दिए गए उनके मायने
कुछ शब्द हमेशा छुपे रहे
नहीं आए कभी भी सामने
बस बेचैन और पागल बनाते हुए
धधकते रहे
बहुत खराब समय में भीतर ही भीतर

कुल जमा इतना ही है
अकेले भटकते कवि की उदास कथा
कि आखिर में बचे हैं
कुछ टूटे-फूटे छूटे अधूरे शब्द
सो आपके सामने हैं ... |
















|| कोई नहीं जानता ||

कोई नहीं जागता
वादक के सिवाय
कोई नहीं पुकारता
वादक की तरह

कोई नहीं देखता
वादक के टूटे तार
कोई नहीं सुनता
भीतर का रोना

कोई नहीं जानता
आख़िर क्यों चुना
वादक ने
यह सन्नाटे भरा संसार ?

भटकते हुए बदहवास
आख़िर क्यों
बजाता रहा
वह सिर्फ़ वाद्य ?

भुलाते हुए ख़ुद को
आख़िर क्यूँ उड़ता रहा
वह बार-बार अकेला
दूर आसमान में ?

अरसा हुए
पूछे गए जब
वादक से ये सवाल
झुका लिया
ख़ामोश वादक ने
अपना सिर
और बजाने लगा
बस वाद्य... |



















|| थोड़ा सा ||

थोड़ा सा रंग
मिल गया है
संगीत में

थोड़ा सा संगीत
गूँज रहा है
पेड़ में

थोड़ा सा पेड़
उग रहा है
मुझमें

मै थोड़ा सा सूर्या हूँ
थोड़ी सी नदी
थोड़ी सी चिड़िया

थोड़ा सा मैं बिखर गया हूँ धूल में
थोड़ा सा मैं जम गया हूँ चट्टानों में
थोड़ा सा मैं थम गया हूँ अँधेरे में
थोड़ा सा मैं बह रहा हूँ हवा में

थोड़ा सा मैं
बादलों में घुलकर
तुम्हारे भीतर
लगातार बरस रहा हूँ ... |



















|| मैं पागल हूँ ||

मैं पेड़ के साथ
फल होना चाहता हूँ
और समुद्र के साथ मछली

चूँकि पक्षी के सुख का पता
घोंसले के पास है
और भूखे आदमी का दु:ख़
सिर्फ़ रोटियाँ ही जानती हैं

फिर यदि
मैं होना चाहता हूँ
फल, मछली, रोटियाँ
या घोंसला
तो क्या मैं पागल हूँ ..?

हाँ ...
मैं पागल हूँ... |



















|| एक फूल खिला ||

एक फूल
देर तक
टहनी में खिला
फिर धरती पर गिरा
तो धरती में खिला

देखा दो आँखों ने
उसे तो
वह आँखों में खिला
फिर आँखों में खिला
तो मन में भी खिला

मन में खिला एक फूल
तो स्मृति में खिला
फिर बार-बार

इस तरह
स्मृति में बार-बार
खिलता एक फूल
एक बार
शब्दों में भी खिला

यूँ शब्दों में खिला
एक फूल एक बार
तो फिर
हमेशा खिला ही रहा... |

[ रायपुर में बीमा चिकित्सा पदाधिकारी के रूप में कार्यरत आलोक वर्मा का एक कविता-संग्रह 'धीरे-धीरे सुनो' प्रकाशित हुआ है, जिसे मध्य प्रदेश साहित्य परिषद के 'रामविलास शर्मा सम्मान' से नवाज़ा जा चुका है | आलोक वर्मा की यहाँ दी गईं कविताओं के साथ प्रकाशित चित्र कनाडा में रह रहीं चाईनीज़ चित्रकार विनिफ्रेड ली की पेंटिंग्स के हैं | बीजिंग में 1934 में जन्मीं वान-चुनयु , विनिफ्रेड ली का पूर्व नाम, 1977 में कनाडा आ गईं थीं | विनिफ्रेड ली अपनी वाटर कलर पेंटिंग्स के लिये कला जगत में जानी जाती हैं | उन्होंने प्रायः फ्लावर्स व बर्ड्स को अपने केनवस पर चित्रित किया है | ]

Tuesday, August 3, 2010

अब्दुल बिस्मिल्लाह की कविताएँ



















|| चूज़े ||

चूज़े देखते हैं
कि किस तरह उनकी माँ
अपने दरबे की सीमा में
बैठती है, खड़ी होती है
और उन्हें खेलने देती है

चूज़े देखते हैं
कि किस तरह उनकी माँ
कूड़े में, गोबर में
और राख में उनके लिए
महीन दाने तलाशती है

चूज़े देखते हैं
कि किस तरह उनकी माँ
बिल्ली के आक्रमण से
उन्हें आगाह करती है

चूज़े देखते हैं
कि किस तरह उनकी माँ
सिल पर, चौके पर
और दहलीज़ पर
चोंच तेज करने का
सलीक़ा बताती है

और चूज़े देखते हैं
कि किस तरह उनकी माँ
उन्हें खूंखार दुनिया सौंपकर
दावत बन जाती है

चूज़े देखते हैं
कि उनकी चोंच
उन्हें शोरबा बनने से
बचा सकती है या नहीं

चूज़े
गमले की हरी पत्ती पर
अपनी चोंच आज़माते हैं

पत्ती टूट जाती है

चूज़े सोचते हैं
दुनिया क्या
इस पत्ती से ज्यादा सख्त होगी ?



















|| खेल-खेल में ||

हाँ, ऐसा होता है
खेल-खेल में
रोज़ ही ऐसा होता है

रोज़ ही वे
दरोगा बनते हैं
रोज़ ही वे
सिपाही बनते हैं
रोज़ ही तुम
चोर बनते हो

रोज़ ही वे
कन्हैया बनते हैं
रोज़ ही तुम
पालकी बनते हो
रोज़ ही वे
राजा बनते हैं
रोज़ ही तुम
रैयत बनते हो

हाँ, ऐसा रोज़ ही होता है
रोज़ ही उनका गुड्डा होता है
रोज़ ही तुम्हारी गुड़िया होती है

रोज़ ही वे
अपना गुड्डा सजाये आते हैं
और तुम्हारी
सुघर-सलोनी गुड़िया ले जाते हैं

हाँ, ऐसा रोज़ ही होता है
कि उनका गटापार्चा का बबुआ टूटता है
और वे चले जाते हैं
रोनी सूरत बनाये
तब तुम उनके बबुआ को
दफ़न करते हो
और तालियां बजाते हो

खेल-खेल में
ऐसा तो रोज़ ही होता है



















|| कागज़ ||

काग़ज़ का यह छोटा-सा टुकड़ा
अपने दिल पर
दु:ख़ निख सकता है किसी का
यह ख़त लिख सकता है
किसी के नाम
अपने सीने पर

अपने चेहरे पर
फ़ैसला लिख सकता है यह
कैसा भी

काग़ज़ का यह छोटा-सा टुकड़ा
अपनी हथेली पर
पूरी की पूरी तबदीली
लिख सकता है















|| पांच पानियों का देश ||

पानी का नाम मत लो यहाँ
कोई सुन लेगा
तो गज़ब हो जाएगा

जी नहीं
अब तो उन नदियों के
निशान भी नहीं रहे यहां
उन नदियों का नाम मत लो
कोई सुन लेगा तो गज़ब हो जाएगा

जी नहीं
वे सूखी नहीं घाम में
वे लुप्त नहीं हुईं पाताल में
उन्हें चुरा ले गया कोई परदेसी
अपनी पोली छड़ियों में भरकर
उस परदेसी का नाम मत पूछो
कोई सुन लेगा तो गज़ब हो जाएगा

जी नहीं
यहाँ हथियार नहीं चले
यहाँ नहीं हुई कोई बग़ावत
यहाँ सिर्फ़ बदमस्त हो गये
पानी के बिना
कुछ हाथी, कुछ घोड़े ओर कुछ परिन्दे

आगे क्या हुआ
कैसे बताया जाए
कोई सुन लेगा तो ग़ज़ब हो जाएगा

जी नहीं
सूरज का रंग
यहाँ भी पहले
लाल ही होता था
जब वह पांच-पांच पानियों के भीतर से
नहाकर निकलता था
अब कितना सफ़ेद हो गया है इसका चेहरा
कि जैसे काग़ज़ का कोई गोल टुकड़ा
चिपका दिया गया हो आकाश के सीने पर

मत पूछो
काग़ज़ में लिखी इबारत की व्याख्या
कोई सुन लेगा तो ग़ज़ब हो जाएगा

हवा में
बनी हुई है हरारत
लगातार
और वे चुप हैं
सड़क पर सड़ रहें हैं
खून के थक्के
और वे चुप हैं
खिड़कियों में
खुली हुई हैं
सहमी, डरी, उदास पुतलियां
और वे चुप हैं

वे कौन हैं ?
उनका नाम क्या है ?
मत पूछो, मत पूछो, बन्धु
वर्ना कोई सुन लेगा तो ग़ज़ब हो जाएगा

[ कथाकार के रूप में प्रतिष्ठित अब्दुल बिस्मिल्लाह ने कविताएँ भी लिखीं और उनकी लिखी कविताएँ चर्चित भी हुईं तथा पुरस्कृत भी | उनकी अनेक रचनाएँ मराठी, मलयालम, बंगला, उर्दू, अंग्रेज़ी तथा जापानी में अनुदित हुई हैं | यहाँ दी गई कविताओं के साथ के चित्र इंदौर के युवा चित्रकार प्रेमेन्द्र सिंह गौड़ की पेंटिंग्स के हैं | मध्य प्रदेश के शाजापुर में 1978 में जन्मे और इंदौर के गवर्नमेंट इंस्टीट्यूट ऑफ फाइन ऑर्ट से एमएफए करने वाले प्रेमेन्द्र ने इंदौर, दिल्ली व मुंबई में अपनी पेंटिंग्स की एकल प्रदर्शनियाँ की हैं तथा धार, उज्जैन, इंदौर, जबलपुर, दिल्ली, मुंबई, बंगलौर में आयोजित समूह प्रदर्शनियों में भी अपने काम को प्रदर्शित किया है | ]

Thursday, July 29, 2010

कुमार गन्धर्व के लिये अशोक वाजपेयी की कविताएँ



















|| बहुरि अकेला ||

अन्तराम्भ
समय से बाहर
शब्दों दुखों घावों के शिल्प से
जल जो नदी है
स्मृति में एकत्र
जासूस की तरह जीवन
यह जो
ढुलकने से पहले
मरने के पहले कितने स्थगन
थोड़ा-थोड़ा हमें भी
रंग वही सूर्यास्त उदय का
विदा का कोई समय नहीं
किए न किए का अरण्य
कहीं नहीं के घर में
घर और घर नहीं
फहा फाहा उड़ते समय से
किस शैव चट्टान पर
प्रार्थना में कोई शब्द नहीं
होना पृथ्वी न होना आकाश
असंख्य में से सिर्फ़ एक
अंत का समय आरम्भ का समय



















|| जल जो नदी है ||

नदी बिलकुल शान्त कभी नहीं हो पाती चाहकर भी
कोई न कोई आवाज़ या सन्नाटा गूँजता हुआ सा
उसके तट पर उसके मझधार में किसी चट्टान से
नीरव टकराते उसके जल में |
नदी बहती है धरातल पर सूखकर रेत के नीचे थमकर
प्रतिपल जाती हहुई अपने विलय की ओर
फिर भी उच्छल
धूप अँधेरे लू-लपट
सुख की झूलती हुई डालों
दुःख के खिसकते-ढहते ढूहों से
हर सर्वनाम को लीलता हुआ
आदि और अंत से उदासीन
सिर्फ़ बहता चलता है जल
जिसे शायद पता ही नहीं चलता कि वह नदी है |














|| थोड़ा-थोड़ा हमें भी ||

जैसे सूर्योदय बुलाता है
कलरव ओस हलकी सी ठण्ड
उषा की केलि को
वैसे ही पुकारती है
एक ही मृत्यु
दूसरे के जन्म को-
तिल-सकट कच्चे दूध में पड़े तिल
माघ की ठण्ड में हुए शुभारम्भ को-
एक जन्म ही नहीं फुँकता
एक जीवन की ही नहीं होती अन्त्येष्टि
कुछ और जन्म भी झुलसते हैं
कुछ और जीवन भी सरकते हैं
अंत कि ओर-
जो होने न होने को गाता है
उसी का होना अन्तत: मौन है
उसी का न होना शान्ति |
हम अपनी चुप्पी के पार
एक पुकार सुनते हैं
और अनसुनी करते हैं |
जो जाता है
थोड़ा-थोड़ा हमें भी ले जाता है
और इसलिए कभी
पूरी तरह से नहीं जाता है |















|| विदा का कोई समय नहीं है ||

कौन से प्रतीक, कौन से रंग
कौन सा समय
चुनती है विदा ?
अपनी विजड़ित आभा में स्थिर चट्टानें
दिन को डूबने से थामे हुए गिरिमालाएँ
अँधेरे में गाने की इच्छा-सा ठहरा हुआ सन्नाटा
वनस्पतियों में निर्बाध चमकती हरीतिमा
भोजन के बाद बचे-खुचे से सजी थाली
कुनकुने पानी से भरी छलछलाती बाल्टी
साँकल बंद करने को उठा हाथ
नींद कि नीरव निस्स्वप्न घाटी की गहरी चुप्पी
चिड़ियों को ख़बर लगाने के पहले का अर्द्धजागरण
- कौन कब अचानक
कह देगा
अलविदा ?

विदा
अपूर्णता से
किसलयों कुचाग्रों केलि से
शब्दार्थ मौन रूपकों से
गान धैर्य अजात पौत्र से
सगुण निराकार से
अँधेरी निर्जन सड़क पर सुबह के आदमी से
मसाला पीसती बार-बार झार से आंसू पोंछती औरत से
विदा
देवताओं के पाखण्ड और ब्रह्म-प्रपंच से
विदा ककहरे से
विदा अक्षरारम्भ और अधूरे वाक्य से
हुआ-होगा-होता से
हर सर्वनाम से
क्रियापदों के झुण्डों बवंडर खिड़की के काँच से
गिलहरियों की धूप और चिड़ियों के अवकाश से
विदा का कोई समय नहीं है
हर क्षण विदा है
जो बीतता है
विदा लेता है
अक्सर बिना जाने भी |

[ कुमार गन्धर्व के लिये लिखी अशोक वाजपेयी की इन कविताओं के साथ प्रकाशित चित्र युवा चित्रकार महुआ रॉय की पेंटिंग्स के हैं | ललित कला अकादमी की नई दिल्ली स्थित कलादीर्घा में अभी हाल ही में 'सोपान' शीर्षक के अंतर्गत आयोजित एक समूह प्रदर्शनी में महुआ रॉय के चित्रों ने दर्शकों व कला मर्मज्ञों का खास तौर से ध्यान खींचा तो शायद अपनी चित्र-भाषा की अप्रतिमता के कारण | महुआ रॉय ने जामिया मिलिया इस्लामिया से पहले बीएफए और फिर एमएफए किया है | इसके आलावा नेशनल म्युजियम से उन्होंने 'इंडियन ऑर्ट' में एक कोर्स भी किया है | महुआ ने स्कूलों, संस्थाओं व कार्पोरेट क्षेत्र के लिये एक आर्टिस्ट व डिज़ायनर के रूप में काम करने के साथ-साथ कई समूह प्रदर्शनियों में अपने चित्रों को प्रदर्शित किया है तथा आर्ट-कैम्प में भाग लिया है | ]